क्या क्या न सहा
क्या क्या न सुना
बस एक तुझे पाने को।
छोड़ दिया मैंने खुद को
बस एक तुझे रिझाने को।
हाथ भी जोड़ा
पाँव भी पकड़ा
बस एक तुझे मनाने को
नीचे खुद को गिरा दिया
बस एक तुझको पाने को।
मनाया बहुत
न माना तू
मुँह मोड़ा मुझे रुलाने को
खुद को मैंने मिटा दिया
बस सिर्फ तुझको पाने को।
मैं रोती रही
मैं बिलखती रही
तू चला नयी दुनिया बसाने को
मैंने भी कितने जतन किये
बस एक तुझको भुलाने को।
तू भूलता नहीं
मैं भूलती नहीं
तू रोग बना मुझे तड़पाने को
जिस अगन में मैं झुलस रही
वो लगी है मुझे मिटाने को।
एक बार जो कहता
मुझसे ऐ सनम
तैयार थी मैं दुनिया भुलाने को
तू ऐसे जुल्मी मौन रहा
कुछ बचा न दिल बहलाने को।
मर जाऊँ
या मिट जाऊँ मैं
तू बता है क्या फरमाने को
मैं चंचल चितवन चहक रही थी
तूने कैद किया मुझे मिटाने को।
प्रेम है या
है पागलपन
कोई नहीं है ए समझाने को
एक दर्द है जिससे तड़प रही
तू आजा दर्द बटाने को।
क्या गलती की
क्या गुनाह हुआ
क्यूँ छोड़ दिया मुरझाने को
मैं एक नन्ही सी कली ही थी
मसल दिया क्यूँ मिट्टी में मिलाने को।
ख्वाब नहीं थी
परछाई नहीं
चाहा था हकीकत बनाने को
मैं अपनी ही ज़ात से भटक गयी
बस एक सनम तुझे पाने को।।