कहते कुछ भी न भले ही
बस सुनते हर बात मेरी।
करती मैं बस प्यार की बातें
दुनिया और संसार की बातें
सपनों और अरमानों की भी
अपने और बेगानों की भी
कहते बस हूँ... हूँ... तुम
और सुनते हर बात मेरी।।
मैं उछल कूद कर बतियाती
मैं हँसती और गुसियाती
सुनते हो यह गुमान जो होता
मानते हो अभिमान भी होता
भ्रम मेरा कहीं टूट न जाय
सो सुनते हर बात मेरी।।
कहते कुछ भी न भले ही
बस सुनते हर बात मेरी।।