विवाह हो या निकाह रहे
हमेशा समाज के बनाये घेरे
शारीरिक और सामाजिक
संबंधो को एक परिधि में रखने के
न स्त्री इस रेखा को पार करे
न पुरुष इस रेखा के भीतर
किसी अन्य के साथ प्रवेश करे
तभी तो सार्थक होगा
निकाह का कुबूल होना
अग्नि का साक्षी होना
विवाह बदल रहे हैं अब
कल तेरे ,आज मेरे होने में
आज निकाह तीन लफ्जों से
बदल रहे हैं उमरभर रोने में
आज स्त्रिया पछाड़े मार कर नही रोती
आज पुरुष रोनी सूरत बनाकर
कतल नही करते किसी का
आज जश्न मनाया जाता हैं
चाहे के अनचाहे हो जाने पर
फिर भी
विवाह ,परिणय , या निकाह कहो
समाज की धुरी हैं यह और होते रहेंगे
और हम यूँ ही कभी ख़ुशी से
कभी उदासी से
इन रिश्तो को ढोते रहेंगे
ढोते रहेंगे ............
#नीलिमाशर्मा #निविया
एक पुरानी कविता की कुछ पंक्तियां