लफ्ज भी बड़े अजीब होते हैं.....कभी कभी ये दिल जीत लेते हे तो कभी ये दिल तोड़ देते हैं,समझ समझ की बात हे मानों तो ये अपने हे ....ना मानों तो ये पराये हैं .रिश्ता अगर दिल से हो तो वहाँ लफ्जोंका कोई मायना नहीं,पर अगर ना हो तो उस रिश्तेका कोई मोल नहीं.इसलिए हमेशा नाराजगी लफ़्ज़ोंसे होनी चाहिए....इंसानोसे नहीं,क्योंकि लफ्जोंका क्या हे, हम केहकर उसे भूल जाते हे मगर.....सच्चे रिश्ते कभी भुलाये नहीं जाते.