मनुष्य के अन्तःकरण में ही उसका देवत्व और असुरत्व विद्यमान है। जब तक हमारा देवता जागृत रहता है और हम विभिन्न कल्याणकारी कार्यों में संलग्न रहते हैं तब तक आन्तरिक असुरता भी दबी हुई पड़ी रहती है पर यह प्रसुप्त वासनायें भी अवकाश के लिये चुपचाप अन्तर्मन में जगती रहती हैं समय पाते ही देवत्व पर प्रहार कर बैठती हैं?
? पं श्रीराम शर्मा आचार्य