आया एक दुलारा
सेवाभावी
बडो का आदर करे
कहे बडे जो कहे सच कहे
करता गया काम
लेता रहा रब का नाम
बडे बोलते गए
वैसा करता गया
मन मार मार जीता गया
अपनी पसंद का न कर पाए
गुरु आकर कहे
ये उसके लिए अच्छा
तो चाचा भतीजे को वहां भेजे
दुजे गुरु कहे आपके भतीजे के लिए ये अच्छा
तो चाचा वहां भेजे
कुछ न ढंग का कर सका
महेनत करे पर फल न मील सका
चीढाया जाता उस पर गुस्सा जाता
समझ न आए क्या करें
बस चुप कर रेह जाता
बडो का मान रखने
चीढाए तो जवाब देना न आता था
सच बोले तो कोई सुनता नहीं था
तो धीरे धीरे केहना ही कर दिया बंद
इतनी समझ न थी
सच तो बेहता पानी
आज नहीं तो कल समजते है
पर नहीं समझते इसलिए क्या केहना सोच
केहना ही कर दिया बंद
बहोत किताबें पढ़ी
अच्छी अच्छी बातें सुनी
ईश्वर का नाम जपता रहा
और केहता गया तु कहे वही सही
थोडा शकी दिमाग
उस वजह से पत्नि पर शक कीया
तो पति और पिता का फर्ज भूला
क्या करता
वैसे भी सोच जो लेहरा रही थी
पैसों की, पद की, जुठ की
क्या करे जो भी अच्छा काम करे
पर उल्टा ही सब होता
पर जैसा आता वैसा करता रेहता
पर न बच्चोने न पत्निने शिकायत की
बेटी को कमी खलती
वो लडा करती
हम क्यु जाते न बाहर
हम क्यु न रहते साथ
सवालों का जवाब ढुंढती रहेगी
पिता को समझाती
खुद समझती
मां से भी सवाल कीया करती
लोगो से जानती कैसे सुलझे उलझन
पर सुलझा दी पहेली जो
जीवन की मीली थी
पिता ने अच्छाई का दामन न छोड़ा
खुद से ढुंढा रोग का इलाज
बेटे ने भी अपने पैरों पर खड़ा हो दिखलाया
छोटी उम्र में घर का बोज उठाया
सच तो मानो कुट कुट भरा पडा था
इसलिए जुठ के सामने लडता रहा परिवार
अस्त व्यस्त है पर असभ्य नहीं
समझ है पर चालाकियां नहीं
पीछे दीखता है
पर सत्य की रोशनी से चमकता है
बेटा महेनतु है
बहोत ही ज्यादा भावुक हैं
इसलिए तो जुठ हो गुस्सा आ जाता
बेटा बडो का करें आदर
दिल का है साफ
न है मन मुटाव
न कीसीसे बैर
सब का अच्छा सोचें
मदद को दौड़े
पर समज न सके
कहां कीसको कीतनी मदद करनी
अपना न देख सके
बस दौडे रखें
बाप-बेटे का यही तो है हाल
की कोई बुरा लगाएगा तो
पर अब पता चलता जा रहा
कोई न बुरा लगाता
सबको रेहता है पता
अपने काम में रहते हो व्यस्त
उसको दुसरो की मदद को कहा मीले वक्त
बस समझ जढती जाए वैसे वैसे
सुलझे है उलझन...ॐD