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नज़्म
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समंदर सा सपना मेरा नहर बनके आयी थी वो,
बिखरे हुई ख़्वाहिशे सारी साथ अपने लायी थी वो,
महकती सी आँचल से आसमान सी मुझपर छायी थी वो,
भूले बिसरे ख़याल सारे मुस्कुराते हुए सपनों मे समायी थी।
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सोनल सुनंदा श्रीधर