हर घड़ी हर लम्हा धड़कता ये दिल
चाहता पाना न जाने कौन सी मंज़िल
हर एक पल साँसों की कड़ी जारी है
फिर अगली और अगली की बारी है
उम्र सबकी सारी यूँ ही गुज़रती है
उम्मीद की रौशनी आँखों में भरती है
फिर चाहे कभी कोई लम्हा टूटता हो
या उम्मीद का दामन यकायक छूटता हो
ख्वाब साँसों में फिर भी महकते हैं
चाहतों के साहिल फिर भी चहकते हैं
बस उन्हें छूने की उम्मीद खोती है
कभी खुली आँख बस यूँ ही सोती है
हर पल वक्त रूकने इन्तज़ार रहता है
क्यूँ ख़ून रगों में रूक रूक के बहता है