धीरे धीरे
घर की ओर
कदम अभी तो बड़े ही थे।
एक आवाज आई,
उस लफंगे ने बाइक जोर से रोकी
में घबराई
डर के मारे अंदर ही बौखलाई थी।
मनचला था जो पीछे से कुछ मुझ पे छिड़कने लगा।
तन बदन में घभराहट जोर से बढ़ चली।
अभी तो मेने चलना सीखा था ।
उनको सामने बोलना सीखा था ।
इतने से ही वो डर गए।
तेजाब मुझपे छिडक गए।
कुछ भी समझ पाती,
उससे पहले तो आग लगाई थी।
बीच राह में किसी की बहन किसी की बेटी
आग के लपटो से हर गई।
पर सुन बे मनचले जल्द ही वक़्त बदलेगा।
घर पे तेरे बच्ची होगी मन तेरा भी रो लेगा।
कब तक निर्भया कब तक *संजली*
कोई तो फूलन आएगी।
बीच राह में तुम लोगो की जान तब घभराएँगी।
- कुमार