पत्ते दर पत्ते उड़ते चले गए,
शाखो ने भी कई बार रंग बदले,
छाल बदल गए,
तने - जड़ भी बदले,
मिट्टी बदली,पानी बदला,
आबो हवा भी कई बार बदले,
कभी धूप,कभी घना छाव,
कभी बर्फ़ के चादर ने भी जकड़ा,
काले कौवो का भी घर था,
और रंग बिरंगे तोते मैनो का भी,
पर हर रंग में ढलता चला गया,
खड़ा एक जगह, अबिचलित,
वो बूढ़ा पेड़ पीपल का,
सबका भार ढो रहा था,
बिना किसी अदब के,
बिना थके बिना शिकायत किए,
वो बूढ़ा पेड़ पीपल का।
© Krishna Katyayan 2018