कहानी:-हर सिक्के के दो पहलू
बात उन दिनों की है ,जब मैं काॅलेज में पढ़ा करती थी
।बड़ी जल्दी रहा करती थी काॅलेज जाने की ।मानो काॅलेज जाने के नाम पर मेरे पर ही निकल आए हों । और नए -कपड़े खरीदने के लिए तो मैंने पूरा घर ही सर पर उठा रखा था । जींस टाॅप ,लाँग स्कर्ट के अलावा एक भी सूट खरीदना गंवारा नहीं था।
एक अलग आजादी महसूस होने लगी थी क्योंकि रोज -रोज स्कूल में वही सफेद सलवार और नीली कुर्ती पहनकर तंग आ चुकी थी ।ऊपर से वो दो तनी हुई रिबन से बंधी चोटिया उफ ! अब जाकर छुटकारा मिला था। लेकिन मेरे पड़ोस में रहने वाली और मेरे ही काॅलेज में पढ़ने वाली 'रमा' के पहनावे में कोई खास अंतर नहीं आया था, बस सलवार सूट का कलर बदल गया था ।मम्मी मेरे पहनावे को देखकर हमेशा मुझे रमा का ही उदाहरण देती कि "वो भी तो लड़की है ! कितनी सादगी से कपड़े पहनती है ! और एक ये है ! कम से कम एक दुपट्टा तो डाल लिया कर टाॅप पर।" और मैं खिलखिलाकर हँस देती कि "भला कोई जींस पर भी दुपट्टा डालता है।"
एक दिन मैं काॅलेज से लौट रही थी तो जो देखा !
उसको देखकर आँखें खुली की खुली रह गई । मेरे आगे -आगे रमा बाइक पर दो लड़कों के साथ कस कर कमर में हाँथ डालकर, वो भी बिना दुपट्टा के बैठ कर कहीं जा रही थी । वो रमा जिसका उदाहरण देकर मुझे हमेशा नीचा दिखाया जाता था आज वो इतनी बेशर्मी से लड़कों के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है। मैंने भी निश्चय किया कि अभी की अभी घर जाकर सबको बताती हूँ ! फिर सोचा कि पहले इसका पीछा करके पता करूँ कि ये और क्या- क्या करती है।और एक्टिवा से पीछा करने लगी। बाइक एक हास्पिटल के सामने जाकर रुक गई । पहले रमा जो कि सबसे पीछे बैठी थी उतर गई। फिर बीच में बैठे बेहोश लड़के की कमर में बंधा हुआ दुपट्टा ठीक करते हुए जल्द ही उसे दूसरे लड़के की सहायता से कंधों का सहारा देकर हास्पिटल के अंदर चली गई । सारा माजरा समझते ही मुझे याद आया ,कि ये तो वही लड़का है ,जो रास्ते पर एक्सीडेंट हो जाने के कारण बेहोश पड़ा था और कोई उसकी मदद के लिए आगे नही आना चाहता था खुद मैं भी नहीं । सिक्के का दूसरा पहलू समझते ही मेरी शरमिंदगी का कोई ठिकाना नहीं रहा और लौट पड़ी नीची निगाहों के साथ अपने घर।
आज उसके बारे में सोचते ही खुद को बहुत छोटा महसूस करती हूँ!
सीमा शिवहरे 'सुमन '
भोपाल।