मेरी माँ मात्र माँ नहीं मेरे भाग्य की निर्माता हैं।अपार प्रेम का कल्पवृक्ष हैं जिनके हृदय से निरंतर आशीष् झरता रहता है जिसमें कभी पतझड़ होता ही नहीं है।वह ज्ञान की गंगा है,मेरे स्वप्न की सर्जना हैं ,मेरी आस्था की नई भोर हैं और मेरी श्रद्धा की पूनम उनकी बाँहों का झूला और आँचल की अद्भुत छाया में भूख,क्रोध, ईर्ष्या,द्वेष यहाँ तक की भयंकर पीड़ा का भी अंत स्पर्श मात्र से चला जाता है।हर जन्म में हे परमात्मा ! मुझे मेरी प्यारी माँ की कोख से ही जन्म मिले जिससे मैं फिरसे उनका सानिध्य पा सकूं।।
डा रंजना शर्मा