कविता- मंझील
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राह चलते चलते
रुकना कभी कभी
अच्छा होता है...
कहा तक आये है
अभी कितना है जाना
कितना बाकी है चलना
पता लगता है...
खुद को हिम्मत देकर
आगे निकल पडना
मंझील तक का रस्ता
आसान लगने लगता है...
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अरुण वि.देशपांडे-पुणे
9850177342