अभी कल की ही तो बात है मैं.. मैं बेठी थी शामको गेलरी में ,
सूरज ढल रहा था एकदम लाल खून की तरह दिखता ,
हाथ में चाय का कप पकडे मैं तन्हाई मे मेला लगाएं ,
धीरेधीरे बातें होने लगी अपने आपसे, अपने बारे मे मैने मुझसे ही कई राज़ खोले ,
और पता चला के पता ही नही था के खुद के अंदर भी एक मेला लगाये बैठी हूं,
सब तो मेरे ही अंदर है, जो चाहीये सब भीतर ही पडा है
तो बाहर की खोज कैसी? और फिर .. और फिर जींदगी बहुत आसान करली।
@B