#Kavyotsav इक चप्पल
माँ ! ला दो न इक चप्पल मुझको।
मेरी सहेली मुझे चिढ़ाती,
रोज़ पहनकर काम में जाती।
ठण्डी मेरी पाँव में लगती,
जैसे चाटा गाल पे मारती।
गन्दे मेरे पाँव हो जाते,
रोज़ गेट पर साहब मुझको,
धुलकर पैर आने को कहते।
ठण्डा मौसम, ठण्डा पानी,
पाँव मेरे सुई चुभोती।
साहब का आँगन लम्बा-चौड़ा,
जैसे जमा हो वहाँ बरफ़ का गोला।
कैसे बुहारती, मैं ही जानू।
माँ ! ला दो न इक चप्पल मुझको।
(माँ मुस्कुराकर) बिटिया! इक चप्पल से करोगी क्या तुम?
चप्पल दो के लिए पैसे तो हों,
जितनी तुम देती हो, मैं कमाती हूँ,
इस महँगाई में किसी तरह,
रोटी ही जुटा पाती हूँ।
इस महीने काट लो बिटिया,
अगले महीने ला दूँगी।
Contd.