#KAVYOTSAV
ये सीख उसकी।
वक़्त वे वक़्त ये बारिश झर रही थी,
मुझे बस तलब थी ,मुझे बस तलब थी,
हाथ खोले थे मैंने कैद करने को बूंदे
मैं समझी नहीं थी, आज़ाद राहें थी उसकी,
तड़प तो वो भी रही थी ,बंद मुट्ठी में मेरी,
खोल देती तो शायद ,कुछ देर रुकती,
ना मैं रोक पायी, ना वो रुक सकी थी,
वक़्त लगा मुझको थोड़ा, पर समझ मैं गयी थी
ये सीख उसकी, ये सीख उसकी।
महक वो रही थी कली भीनी भीनी
उसकी खुश्बू से मैं खिंची जा रही थी,
तोड़ लायी मैं उसके आशियाने से उसको,
महकती रहेगी सदा ये यूँही, बस इसी बात पे मैं गुमान कर रही थी,
पर अपने आशियाने से बिछड़ी ,तो वो मुरझा गयी थी,
देर तो हो गयी थी,पर समझ मैं गयी थी,
ये सीख उसकी ,ये सीख उसकी।
साहिल के किनारे, मैं घर बना रही थी,
गीली मिट्टी में अपनी दुनियाँ सजा रही थी,
आँखों में चमक थी,अपनी कारीगरी की
देख देख कर उसको मैं मुस्कुरा रही थी,
हाथों में गिरा बहते लहरों का पानी,
आती लहरों से मैं बेसुद बेख़बर थी,
पर समझ मैं गयी थी,
ये सीख उसकी,ये सीख उसकी।
हँसते लम्हों में भी ये वक़्त चल रहा था,
सोचा कैद करलूँ चंद घड़ियों को अपनी
कैसे करती कैद उसको ,वो तो मनचला था,
उदास लम्हो में भी उसपे बस ना चला था,
मनमौजी था वो तो ,अपनी ज़िद पे खड़ा था,
पर जाते जाते मुझे वो समझा गया था,
ये सीख उसकी ,ये सीख उसकी।
वो गिरी,फिर बड़ी,फ़िर गिरी ,फिर बड़ी,
रुकते रुकते,वो अपना मकान बुन रही थी,
मेरी इक टक निगाहें, उसे तक रही थी,
अपनी मंजिल को पाने तक, वो हिम्मत ना हारी,
मैं भूली नही थी ये सीख उसकी,ये सीख उसकी।
धन्यवाद
सोनिया चेतन कानूनगों