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विदाई के दर्द में हर्ष पिरोना - डॉ.रश्मि वार्ष्णेय
माँ, होओ न तुम यूँ उदास,
माना इस घर से हो रही मैं विदा।
जरा करो तुम इतना महसूस,
हुआ है यह क्या पहली दफा ??
खेल-कूद प्रतियोगिता में भाग लेने
भेजा था तुमने हौसला बढ़ा कर।
वापस लौट कर जड़े थे मैंने,
सारे तमगे तुम्हारी साड़ी पर।।
करवट अब जमाने ने है ले ली,
सिमट गई है योजन लंबी दूरी।
डोली बन गई है अब कार-डोली,
यात्रा के साधन बढ़ गए, भोली।।
काम की बात मैं तुमसे कहूँ,
रोजाना वीडियो कॉल पर बतियाऊँ।
आमने-सामने होंगे हम दोनों रूबरू,
दूरी तमाम हो जाएगी उड़नछू।।
मिल बैठ कर रोज बतियाएँगे,
वीडियो-कॉल करना मैं सिखाऊँगी।
जितना आगे तुमने मुझे बढ़ाया,
उतना अब मैं तुम्हें बढ़ाऊँगी।।
रहेंगे सदा एक-दूसरे के सामने,
सुख-दुख सारे साझा करते।
चटखारे ले-ले कर हम करेंगे,
खट्टी-मीठी गोलियों सी बातें।
हल्का होता लग रहा है न,
मेरी विदाई का दर्द सीने में।
दर्द से भरे आँसू ढल गए न,
उल्लास के खुशनुमा साँचे में।।
पैदाइशी रिश्ते में बँधी बिटिया-माई,
खत्म नहीं कर सकती ऐसी विदाई।
प्रेमभावनाओं के धागे में हैं समाई,
दर्द समेट हर्ष की मोतियाँ पिरोई।।