प्रेम
कविता
महापुरुषों ने मानव प्रेम को
जीवन का मूल तत्व माना
दिया प्रेम जड़ - चेतन , मानव को
विश्व प्रेम सबने जाना .
खुदा के बंदे ये
खुदा इनमें रहता
करे जो प्यार इन्हें
खुदा उसे मिलता .
प्रेम कई स्वरूप का
अंत होता एक
पाओ इसके रूप को
दिल बनता नेक .
प्रीति की यही पहचान
दो रंग हो जाते एक रंग
हल्दी - चूना संग
बन जाता एक लाल रंग
पोथी हम सबने पढ़ी
पर ढाई अक्षर प्रेम का
जीवन में उतारना
होता कठिन भाव
दिल अगर इसे समझ ले
जग में फिर न हो
प्रेम अभाव
प्रेम पीड़ा हरता
कुल , जग को तार देता
अपने - पराए के भेदों से ऊपर उठ जाता .
प्रेम के गुण गाए सबने
एकरसता होती वहाँ
शबरी के झूठे बेर खाए राम ने
समरसता हुई वहाँ .
प्रेम में होती विशालता
क्षेत्र , काल , सीमा नहीं होती बाधक
अपनेपन से भर कर
आनन्द लेता साधक . .
जहाँ होता है प्रेम
वहाँ सेवा साथ रहती
जहाँ नहीं होता प्यार
वहाँ ममता दूर रहती .
हर धर्म ने इसे अवतार कहा
माना ईश का सार
सबने इसे प्रेम , इश्क ,मोहब्बत , स्नेह कहा
बसाओ इसमें संसार .
मंजु गुप्ता
वाशी