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पत्र लेखन २९ / १० / २०१८ पूजनीय माँ , नमन . माँ ! मेरी आदर्श हो . तुम्हारी चाहत प्रेम का महासागर , गंगा की लहरों - सा अवर्णनीय है . चाहत का सच बता रही . तुम अंधकार में प्रकाश किरन हो . ईश्वर से भी ज्यादा चाहती हूँ . तुम ईश्वर का प्रतिरूप बनकर सृष्टि का सृजन कर अपना दुग्धपान कराके पालक , पोषक बन धड़कनों की धड़कन बनी . तुम्हें अपने प्राणों से ज्यादा चाहती हूँ . पर्वों की खुशियाँ , मानवता की गुरुवाणी , रामायण की चौपाइयाँ , दुआओं का तीर्थधाम हो . बेटी , मंजु .
प्रेम कविता महापुरुषों ने मानव प्रेम को जीवन का मूल तत्व माना दिया प्रेम जड़ - चेतन , मानव को विश्व प्रेम सबने जाना . खुदा के बंदे ये खुदा इनमें रहता करे जो प्यार इन्हें खुदा उसे मिलता . प्रेम कई स्वरूप का अंत होता एक पाओ इसके रूप को दिल बनता नेक . प्रीति की यही पहचान दो रंग हो जाते एक रंग हल्दी - चूना संग बन जाता एक लाल रंग पोथी हम सबने पढ़ी पर ढाई अक्षर प्रेम का जीवन में उतारना होता कठिन भाव दिल अगर इसे समझ ले जग में फिर न हो प्रेम अभाव प्रेम पीड़ा हरता कुल , जग को तार देता अपने - पराए के भेदों से ऊपर उठ जाता . प्रेम के गुण गाए सबने एकरसता होती वहाँ शबरी के झूठे बेर खाए राम ने समरसता हुई वहाँ . प्रेम में होती विशालता क्षेत्र , काल , सीमा नहीं होती बाधक अपनेपन से भर कर आनन्द लेता साधक . . जहाँ होता है प्रेम वहाँ सेवा साथ रहती जहाँ नहीं होता प्यार वहाँ ममता दूर रहती . हर धर्म ने इसे अवतार कहा माना ईश का सार सबने इसे प्रेम , इश्क ,मोहब्बत , स्नेह कहा बसाओ इसमें संसार . मंजु गुप्ता वाशी
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