अक्ल के दुश्मन।
क्यों? क्यों ये इनसान जिंदा हमराही को बीच रास्ते ठुकरा कर चल पडता है?
फिर क्यों उसके मरणोपरांत, यही अपने आप को मायूसी, अवसाद के दल-दल में फंसा कर, पचतावे के घूंट पीता है?
क्यों वह समझे जाने, सुन लेने की चाह में दर दर हर दिल को टटोलता है?
पर क्यों जब भी कोई यही सद्भाव कि उम्मीद उस से करे, तब वह आसानी से आपने कान के पडदे अपने गर्व से झांक कर, अपना मूह फेर लेता है?
क्या ईश्वर की इस नये युग के आधुनिक मानव की रचना में कोई कमी रह गई?
क्यों फिर विज्ञान, कला, क्रिडा, शस्त्र, शास्त्र के शिखर चूमने वाले इस मानव के व्यक्तित्व में भूखे भेड़ की परछाई रह गई?
जला दें ये ग्रंथों के पन्ने जिसने हमको विवेक सिखाया? तोड़ दें वे पाठशाला, महाविद्यालयों की ऊंची इमारतों को जहां हमने कभी नीति-अनीति का पाठ सिखा सिखाया? क्या तोड़ दें उन मंदिरों, मस्जिदों और हर उन प्रार्थना घरों की ईटों को, जिसने हम में, श्रद्धा, सबुरी और परमात्मा के सत की नीव रची?
क्या फर्क पड़ता है अब, हम कुछ भी करे?
कौन रोक सकता है उसे जिसने स्वैराचार का हाथ थामे, अपनी अक्ल से दुश्मनी मोल ली?