प्रहर...
प्रहर की शुरुआत से प्रहर के अंत तक तुम्हे यू देखता रहूं,
जबतक भी देखूं तुम्हे, हर प्रहर जी भर के बस प्यार करू।
ख्वाहिश हे तेरे इश्क़ के सैलाब में बह जाने की इस दिलको,
तू शमा है ये परवाने की, अब और कितना इख्तियार करू।
जुस्तजू, जुनून, मंजिल तु मेरी, खुदा से पहली बंदगी तू मेरी,
आगोश मे भरलू इसकदर तुम्हे के फिर ना कभी रिहा करू।
हुक्म दे अपने होठों को अब की मेरे होठों से आ मिल जाए,
हो जाने दे गुस्ताखी चाहे फिर इश्क़ ए जंग क्यों ना हो जाए।
इतना इतमद रख लेना मेरी महोबत पे, मेरी ख्वाब ए ताबीर,
कहो तो लिख दू चाहने के अलावा और कोई काम ना करू।
मिलन लाड, वलसाड - सुरत