#kavyotsav
ग़ज़ल (फ़रेब)
हुस्न फ़रेब, बज़्म फ़रेब, ये सारा ज़माना फ़रेब है,
तेरा हमसे दूर जाने का हर बहाना फ़रेब है।
तेरी कुछ आदतों में एक जो सबसे हसीं है,
तेरा नज़रों को झुकाना,शरमाना फ़रेब है।
फ़रेब है तेरी सोती रातों का उठ जाना,
तेरी आंखों का छलक जाना फ़रेब है।
जो की है हमसे मुहब्बत किसी और से न करना,
तेरा अंदाज़ ए वफ़ा जताना फ़रेब है।
जो आने नहीं देती होश में,बेख़्याल कर देती है,
तेरे जाम का वो प्यमाना फ़रेब है।
तू नूर ए मुज्जस्सम या शाह ओ शाहकार,
ऐ हुस्न ए जाना तेरा मुस्कराना फ़रेब है।
होता जो दिल अगर तो जान लेती,
तेरा हमसे यूं दिल लगाना फ़रेब है।
है कुछ नहीं हासिल किसी को इश्क़ में,
इस दोज़क़ में दिल जलाना फ़रेब है।
ये दूरियां जो दरमियां और फ़ासले,
इस ख़्याल से तड़प जाना फ़रेब है।
तू देख अभी और क्या क्या बाक़ी है इन रास्तों में,
तेरा चोट खाना फ़िर आंसू बहाना फ़रेब है।
जानता है ये राज़ महज़ ख़ुदा ओर 'सादिक़',
हमें हर दफ़ा इश्क़ में यूं आज़माना फ़रेब है।
©sadique