आत्मग्लानि
वर्षों पश्चात् हमजोली से भेंट हुई ,मानो बादलों में जैसे चाॅंद निकल आया हो। अपने घर में मित्रों को साक्षात् देख फूली नहीं समाई। रीमा, निशा और पूजा सभी चाय-नाश्ता हॅंसी मजा़क व मोबाइल में उस पल को कैद भी कर रहे थे। पूजा को शाम को ही हरिद्वार पितृ पूजा के लिए भी निकलना था। पर मैं सिर्फ अपनी खुशी के आगे नासमझी कर बैठी, भोजन खाकर जाने की मेरी ज़िद ने उसे रो कर आग्रह करने को विवश कर दिया कि ‘कृपया मुझे मत रोक बस।‘ वो कुछ परेशान होकर दिल्ली से निकली। मैं आत्मग्लानि नहीं सह पाई और माफी माॅंग कर अपनी मित्रता को ऊपर रखा।
.................... अर्चना सिंह जया