Quotes by Kirti kashyap in Bitesapp read free

Kirti kashyap

Kirti kashyap

@kirtimaheshkashyap939064


“एक रात की दास्तां”

शब भर खनकती रही चूड़ियाँ कलाई की,
रक़्स में ढलती गई हर अदा अंगड़ाई की।

चाँद का करम भी कुछ इस कद्र बरसता रहा,
सिलवटों में उतरती रही इनायत रोशनाई की।

सुबह हुई तो फैल गई हर बात शनासाई की,
निशां-ए-उल्फत ने बयां की गुस्ताखियाँ हरजाई की।

Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️


रक़्स = नृत्य, नाच
शनासाई = पहचान, जान-पहचान
निशां-ए-उल्फत = मोहब्बत की निशानी

Read More

"आहिस्ता-आहिस्ता"

वो क़रीब आने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता,
धड़कनें बढ़ाने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।

हम तो जी रहे थे तन्हाई में ही ख़ुशी से,
वो रूह में उतरने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।

उसके लबों ने छुआ जब ताब-ए-जबीं को मेरी,
दिल मोम-सा पिघलने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।

सितारे भी शर्माने लगे जब आगोश में लिया उसने,
फिर सारा जिस्म सुलगने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।

तमाम शब यूँ ही गुज़री गुफ़्तगू में ऐ दिल,
कि फिर चाँद भी ढलने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।

उसकी सोहबत का कुछ ऐसा असर हुआ कीर्ति,
कि हर ज़ख़्म भरने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।

Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️


ताब-ए-जबीं = पेशानी, माथे की चमक
आगोश = बाँहों का घेरा, आलिंगन
शब = रात, रात्रि
सोहबत = साथ, संगत, किसी की क़रीबी मौजूदगी

Read More

"ये खुमारी कैसी"

दिल पे ये छाई अजब सी बेक़रारी कैसी,
इश्क़ इकतरफ़ा है तो फिर ये खुमारी कैसी।

किसी तपिश से न पिघले वो पत्थर हूँ मैं,
फिर तेरे बिना दिल को ये सोगवारी कैसी।

ख़ुद को संभालने की सिफ़त अता है मुझे,
मगर अब हर इक साँस में ये गिराँ-बारी कैसी।

फर्क़ नहीं पड़ता मुझे अब किसी एहसास से,
कह तो देती हूँ मगर फिर ये अश्कबारी कैसी।

आईने से भी अब कोई गुफ़्तगू नहीं होती,
इस बेख़बरी में फिर ख़ुद से ग़मख्वारी कैसी।

तुम निभाओ मोहब्बत, मैं दोस्ती ही निभा लूंगी,
मोहब्बत तो मोहब्बत है, फिर मेरी तुम्हारी कैसी।

ये तवील सफ़र “कीर्ति” तन्हा ही काट लेगी,
अब किसी हमसफ़र से साझेदारी कैसी।

Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️


खुमारी = नशा-सा एहसास, मदहोशी,
तपिश = गर्मी, जलन,
सोगवारी = शोक, गहरा दुःख, मातम,
सिफ़त = गुण, आदत, हुनर,
अता = मिली हुई, प्रदान की गई
गिराँ-बारी = भारीपन, बोझिल एहसास,
अश्कबारी = आँसुओं का बहना, रोना,
ग़मख्वारी = हमदर्दी, हरदर्द होना,
तवील = लंबा, दीर्घ

Read More

"ज़िन्दगी के रंग"

कभी रम्ज़ कभी नुमा है ज़िन्दगी,
कभी गुमाँ तो कभी रवाँ है ज़िन्दगी।

महज़ चंद हरफ़ों में ना होगी बयां,
इक बहुत लम्बी दास्तां है ज़िन्दगी।

फलसफ़ा ये रहा ज़िन्दगी से मेरा,
ख़ामोशी में भी इक अयाँ है ज़िन्दगी।

हर लम्हे को जीना ख़ुद के उसूलों पे,
सच कहती हूँ, फिर खुशनुमा है ज़िन्दगी।

मेरी नज़र से न देखना तुम यारों,
मेरे लिए तो बस सज़ा है ज़िन्दगी।

बेचैनी, बिखरा वजूद, सिसकती रूह,
जैसे मेरे लिए कोई बद्दुआ है ज़िन्दगी।

औरत की ज़िन्दगी कहाँ ख़ुद की हुई है,
असीर है फक़त, न रिहा है ज़िन्दगी।

चलती फिरती इक लाश है “कीर्ति”,
जीते जी मेरे लिए क़ज़ा है ज़िन्दगी।

Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️

Read More

"ख़ुश-बाज़ की किताब"

कभी ख़ुद से मिली तो एक किताब लिखूँगी,
दर्द नहीं, फ़क़त खुशियाँ बेहिसाब लिखूँगी।

सपने जो कभी हक़ीक़त न बन सके मेरे,
उसमें वो तमाम मुकम्मल ख़्वाब लिखूँगी।

बेशक ख़ार ही ख़ार रहे दामन में उम्र भर,
उसमें सभी काँटों को गुलाब लिखूँगी।

सच की रवायतें बहुत निभा चुकी अब तक,
बड़े तहज़ीब से उसमें सब सराब लिखूँगी।

जो बातें कहीं ना जा सकी खुद से कभी,
उन सभी सवालों के उसमें जवाब लिखूँगी।

खुद को लिखूँगी एक ख़ुश-बाज़ सी लड़की,
"कीर्ति" अपने ही नाम एक ख़िताब लिखूँगी।

Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️

Read More

"जॉन ऐलिया के लिए"

तुम ग़ज़लों की जान, जॉन,
ख़ामोशी में भी बयान, जॉन।

टूट कर भी हँसने का हुनर दिया,
तुम खुद में इक इम्तिहान, जॉन।

तुम्हारे हर मिसरे में खुद को पाया मैंने,
तुमसे मिलती है मेरी दास्तान, जॉन।

तुमसे ही सीखा है दर्द को लफ़्ज़ देना,
मगर नहीं है ये काम आसान, जॉन।

तुम्हें चाहने की सज़ा बस इतनी मिली,
तन्हाई को बना लिया पहचान, जॉन।

“कीर्ति” तो बस एक कतरा है दरिया का,
जाने तुम कितनी रूह की जुबान, जॉन।

Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️

Read More

"बेकार की दुनियां"

झूठ‑फ़रेब के बाज़ार की दुनियां,
रिश्तें-नातों के व्यापार की दुनियां।

वफ़ा, उम्मीदें, हसरतें, ख़्वाब,
क्या जाने बेकार की दुनियां।

उड़ान से पहले जो तोड़ दे हौसले,
घमंड में डूबी अहंकार की दुनियां।

हमराह का हमराज़ बनना सीखा नहीं,
मतलब में अंधी हुई गद्दार की दुनियां।

सच की क़ीमत कोई पूछे भी क्या,
मुनाफ़े की भूखी मक्कार की दुनियां।

“कीर्ति” ने देखा है क़रीब से बहुत,
एहसास न समझे पत्थर की दुनियां।

Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️

Read More

"सर्द हवा"

हाए बेरुख़ सी ये सर्द हवा,
क्या कहें कितनी बेदर्द हवा।

पीली पड़ गई यादों की धूप,
उसपर भी चल गई गर्द हवा।

रूह काँपती रही रात भर,
रग-ए-जाँ में उतरी ज़र्द हवा।

ख़्वाबों की लौ को बुझा गई,
कभी बनी नहीं हमदर्द हवा।

हर शख़्स यहाँ बस अपना है,
मेरे हिस्से आई बस फर्द हवा।

जिगर पे जैसे नश्तर चुभा गई,
"कीर्ति" दे गई कितने दर्द हवा।

Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️

Read More

ऐ नए साल वादा है, अब ख़ुद से ही बेइंतहा मोहब्बत करूँगी,
अपने शिकस्त वजूद को ज़र्रा-ज़र्रा मैं फिर से समेट लूँगी।

लोग दो पल की शनासाई में उम्र भर की तन्हाई दे जाते हैं,
ख़ुद को ख़ुद का रफ़ीक़ बनाऊँगी, न किसी और को तवज्जो दूँगी।

Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️

Read More

"संगदिली दिसम्बर"

ले गया लबों की हँसी दिसम्बर,
छोड़ गया आँखों में नमी दिसम्बर।

हमने वक़्त से कोई शिकवा न किया,
फिर भी दिल से कर गया दुश्मनी दिसम्बर।

जो सपने थे सारे चूर-चूर हुए ऐ दिल,
मेरे ख़्वाबों की ठहरा खुदखुशी दिसम्बर।

उम्मीदें कुछ बाकी नहीं नए साल से अब,
जब सब कुछ छीन ले गया यही दिसम्बर।

अब यक़ीन किसी पे न करेंगे ऐ जनवरी,
ये सबक दे गया अभी-अभी दिसम्बर।

हर-सू जश्न में डूबी हुई भीड़ है "कीर्ति",
तुझे भीड़ में तन्हा कर गया संगदिली दिसम्बर।

Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️

Read More