"संगदिली दिसम्बर"
ले गया लबों की हँसी दिसम्बर,
छोड़ गया आँखों में नमी दिसम्बर।
हमने वक़्त से कोई शिकवा न किया,
फिर भी दिल से कर गया दुश्मनी दिसम्बर।
जो सपने थे सारे चूर-चूर हुए ऐ दिल,
मेरे ख़्वाबों की ठहरा खुदखुशी दिसम्बर।
उम्मीदें कुछ बाकी नहीं नए साल से अब,
जब सब कुछ छीन ले गया यही दिसम्बर।
अब यक़ीन किसी पे न करेंगे ऐ जनवरी,
ये सबक दे गया अभी-अभी दिसम्बर।
हर-सू जश्न में डूबी हुई भीड़ है "कीर्ति",
तुझे भीड़ में तन्हा कर गया संगदिली दिसम्बर।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️