"ज़िन्दगी के रंग"
कभी रम्ज़ कभी नुमा है ज़िन्दगी,
कभी गुमाँ तो कभी रवाँ है ज़िन्दगी।
महज़ चंद हरफ़ों में ना होगी बयां,
इक बहुत लम्बी दास्तां है ज़िन्दगी।
फलसफ़ा ये रहा ज़िन्दगी से मेरा,
ख़ामोशी में भी इक अयाँ है ज़िन्दगी।
हर लम्हे को जीना ख़ुद के उसूलों पे,
सच कहती हूँ, फिर खुशनुमा है ज़िन्दगी।
मेरी नज़र से न देखना तुम यारों,
मेरे लिए तो बस सज़ा है ज़िन्दगी।
बेचैनी, बिखरा वजूद, सिसकती रूह,
जैसे मेरे लिए कोई बद्दुआ है ज़िन्दगी।
औरत की ज़िन्दगी कहाँ ख़ुद की हुई है,
असीर है फक़त, न रिहा है ज़िन्दगी।
चलती फिरती इक लाश है “कीर्ति”,
जीते जी मेरे लिए क़ज़ा है ज़िन्दगी।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️