"सर्द हवा"
हाए बेरुख़ सी ये सर्द हवा,
क्या कहें कितनी बेदर्द हवा।
पीली पड़ गई यादों की धूप,
उसपर भी चल गई गर्द हवा।
रूह काँपती रही रात भर,
रग-ए-जाँ में उतरी ज़र्द हवा।
ख़्वाबों की लौ को बुझा गई,
कभी बनी नहीं हमदर्द हवा।
हर शख़्स यहाँ बस अपना है,
मेरे हिस्से आई बस फर्द हवा।
जिगर पे जैसे नश्तर चुभा गई,
"कीर्ति" दे गई कितने दर्द हवा।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️