"ख़ुश-बाज़ की किताब"
कभी ख़ुद से मिली तो एक किताब लिखूँगी,
दर्द नहीं, फ़क़त खुशियाँ बेहिसाब लिखूँगी।
सपने जो कभी हक़ीक़त न बन सके मेरे,
उसमें वो तमाम मुकम्मल ख़्वाब लिखूँगी।
बेशक ख़ार ही ख़ार रहे दामन में उम्र भर,
उसमें सभी काँटों को गुलाब लिखूँगी।
सच की रवायतें बहुत निभा चुकी अब तक,
बड़े तहज़ीब से उसमें सब सराब लिखूँगी।
जो बातें कहीं ना जा सकी खुद से कभी,
उन सभी सवालों के उसमें जवाब लिखूँगी।
खुद को लिखूँगी एक ख़ुश-बाज़ सी लड़की,
"कीर्ति" अपने ही नाम एक ख़िताब लिखूँगी।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️