"आहिस्ता-आहिस्ता"
वो क़रीब आने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता,
धड़कनें बढ़ाने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।
हम तो जी रहे थे तन्हाई में ही ख़ुशी से,
वो रूह में उतरने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।
उसके लबों ने छुआ जब ताब-ए-जबीं को मेरी,
दिल मोम-सा पिघलने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।
सितारे भी शर्माने लगे जब आगोश में लिया उसने,
फिर सारा जिस्म सुलगने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।
तमाम शब यूँ ही गुज़री गुफ़्तगू में ऐ दिल,
कि फिर चाँद भी ढलने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।
उसकी सोहबत का कुछ ऐसा असर हुआ कीर्ति,
कि हर ज़ख़्म भरने लगा, आहिस्ता-आहिस्ता।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️
ताब-ए-जबीं = पेशानी, माथे की चमक
आगोश = बाँहों का घेरा, आलिंगन
शब = रात, रात्रि
सोहबत = साथ, संगत, किसी की क़रीबी मौजूदगी