"ये खुमारी कैसी"
दिल पे ये छाई अजब सी बेक़रारी कैसी,
इश्क़ इकतरफ़ा है तो फिर ये खुमारी कैसी।
किसी तपिश से न पिघले वो पत्थर हूँ मैं,
फिर तेरे बिना दिल को ये सोगवारी कैसी।
ख़ुद को संभालने की सिफ़त अता है मुझे,
मगर अब हर इक साँस में ये गिराँ-बारी कैसी।
फर्क़ नहीं पड़ता मुझे अब किसी एहसास से,
कह तो देती हूँ मगर फिर ये अश्कबारी कैसी।
आईने से भी अब कोई गुफ़्तगू नहीं होती,
इस बेख़बरी में फिर ख़ुद से ग़मख्वारी कैसी।
तुम निभाओ मोहब्बत, मैं दोस्ती ही निभा लूंगी,
मोहब्बत तो मोहब्बत है, फिर मेरी तुम्हारी कैसी।
ये तवील सफ़र “कीर्ति” तन्हा ही काट लेगी,
अब किसी हमसफ़र से साझेदारी कैसी।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️
खुमारी = नशा-सा एहसास, मदहोशी,
तपिश = गर्मी, जलन,
सोगवारी = शोक, गहरा दुःख, मातम,
सिफ़त = गुण, आदत, हुनर,
अता = मिली हुई, प्रदान की गई
गिराँ-बारी = भारीपन, बोझिल एहसास,
अश्कबारी = आँसुओं का बहना, रोना,
ग़मख्वारी = हमदर्दी, हरदर्द होना,
तवील = लंबा, दीर्घ