Trikon - 19 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 19 — तहक़ीक़ात

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Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 19 — तहक़ीक़ात

दो दिन बाद।

नया अड्डा।

शहर के दूसरे छोर पर एक और पुराना माल-गोदाम।

चारों तरफ धूल जमी हुई थी।

बड़े-बड़े कंप्यूटर, स्क्रीन, मशीनें — सब पर प्लास्टिक के कवर पड़े थे।

जैसे किसी ने जल्दी में सब यहाँ जमा कर दिया हो।

बीच में एक मेज़ पर बैठा था जोगी।

स्क्रीन पर लगातार सर्च विंडो खुल रही थीं।

नवीना जांगिड़।

एक पुरानी तस्वीर उभरी।

“मिस जहानाबाद प्रतियोगिता — विजेता।”

एक तंग स्विम-सूट में फोटो, कई साल पहले की।

दूसरी फोटो।

रैम्प पर चलती मॉडल।

फिर कुछ सालों का खालीपन।

गूगल के पन्नों पर बस एक लाइन—

“सामाजिक कार्यकर्ता।”

जोगी ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“अजीब…”

उसने आगे खोजा।

भिवंडी अनाथालय।

नयी नियुक्तियों की उद्घोषणा।

नई संचालिका।

नया स्कूल बस ड्राइवर।

सब कुछ लगभग एक ही समय पर।

बस एक्सीडेंट के ठीक बाद।

जोगी ने प्रिंटर में कागज़ डाले।

बटन दबाया।

प्रिंटर की तेज़ आवाज़ गूँजी—

स्र्र्र्र्र्र्र्र…

कागज़ एक-एक कर बाहर आने लगे।

उसी समय अंदर वाले कमरे से अनीश की आवाज़ आई—

“साला… नींद ही नहीं आई।”

दरवाज़ा खुला।

अनीश बाहर आया।

पीठ पकड़कर हल्का सा खिंचा।

“पीठ अकड़ गई है।”

बड़बड़ाया—

“मालती ने एक लहसुन का तेल बनाया था…

जल्दी में वहीं छूट गया।”

फिर दाँत भींचकर बोला—

“एक बार मिल जाएँ तो इन त्रिकोण वालों का तेल मैं ही निकालूँगा।”

मालती का नाम सुनकर जोगी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

पर उसने तुरंत छिपा ली।

उसे मालती की मौजूदगी सचमुच याद आ रही थी।

उसने कागज़ उठाए।

“सर… ये देखिए।”

अनीश ने गर्दन तिरछी करके चटाख से चटकाई।

जोगी बोला—

“अनाथालय की पुरानी संचालिका विमला दास।”

“इसे रातों-रात क्यों निकाल दिया गया?”

अनीश ने कागज़ हाथ में लिए।

पन्ने पलटे।

फिर हल्की मुस्कान आई।

“शाबाश मेरे ब्योमकेश बक्शी।

बढ़िया।”

उसने कोट उठाया।

“चल।

इस विमला दास से मिलकर आते हैं।”

शाम।

एक पुरानी बिल्डिंग का फ्लैट।

दरवाज़ा खुला।

विमला दास जल्दी-जल्दी अंदर घुसी।

कमरे में हल्का अँधेरा था।

वह फोन पर बात कर रही थी।

“भाई… मुझे तो हरदम लगता है कोई मेरे पीछे है।”

कमरे में बेचैनी से टहलने लगी।

“जल्दी निकाल मुझे यहाँ से… हाँ… जल्दी।”

फोन कट गया।

कुछ सेकंड वह वहीं खड़ी रही।

फिर जैसे थकान उतर आई।

उसने साड़ी का पल्लू ढीला किया।

जल्दी-जल्दी साड़ी खोलने लगी।

ब्लाउज़ के हुक पहले ही खोल चुकी थी।

ब्लाउज़ उतारकर उसने कुर्सी पर डाल दिया।

उसी समय उसे लगा जैसे कमरे में कोई हल्की-सी आहट हुई हो।

वह ठिठक गई।

एक पल तक चारों ओर देखा।

कमरा अँधेरा था।

“हम्म…” उसने खुद से कहा।

और जैसे ही पीछे मुड़ी—

क्लिक।

ड्राइंग रूम का टेबल लैंप जल उठा।

विमला की चीख निकल गई।

सोफ़े पर बैठा था — अनीश।

शांत।

सिगरेट सुलगाते हुए।

विमला घबराकर दरवाज़े की ओर भागी—

पर दरवाज़े के सामने जोगी खड़ा था।

बाँहें मोड़े।

दीवार की तरह।

विमला ठिठक गई।

उसने तुरंत हाथों से खुद को ढक लिया।

जोगी ने नज़र झुका ली।

फर्श से उसकी साड़ी उठाई।

चुपचाप उसकी तरफ बढ़ा दी।

विमला ने जल्दी-जल्दी साड़ी ओढ़ ली।

अनीश ने धीरे से कहा—

“बैठिए, विमला जी।”

कुछ देर बाद।

विमला साड़ी ठीक से ओढ़े सोफ़े पर बैठी थी।

सामने अनीश और जोगी।

विमला की आवाज़ काँप रही थी—

“मैंने… आपको सब सच-सच बता दिया है।”

अनीश ने सिगरेट का कश लिया।

धीरे से पूछा—

“नवीना मैडम ने बताया नहीं… कि लड़कियों का अगले दिन स्कूल जाना इतना ज़रूरी क्यों था?”

विमला ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

एक पल रुकी।

“पहली बार… मैंने किसी को इतनी बेरहमी से किसी मासूम को मारते देखा था।”

उसकी आँखें भर आईं।

“अब रातों को नींद नहीं आती, सर।”

“वही दिखता है… लोहे की सलाख… और गर्दन से गिरता खून।”

उसने काँपते हाथों से अपना माथा दबाया।

“बाहर निकलती हूँ तो लगता है… साये पीछा कर रहे हैं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

जोगी की साँसें तेज़ थीं।

नथुने फूले हुए।

मुट्ठियाँ कसकर भींच रखी थीं।

मन में हज़ारों विचार दौड़ रहे थे।

“एक लड़की को सिर्फ इसलिए मार दिया… क्योंकि उसने आवाज़ उठाई।”

“नंदू सही था… नवीना सच में डायन है।”

अनीश कनखियों से उसे देख रहा था।

फिर धीरे से उठ खड़ा हुआ।

जोगी भी।

दोनों दरवाज़े की ओर बढ़े।

दरवाज़ा खोलते हुए अनीश एक पल को मुड़ा।

सिमटी हुई विमला को देखा।

और शांत स्वर में बोला—

“शहर छोड़ दो।

जितनी जल्दी हो सके।”

अनीश और जोगी बिल्डिंग से बाहर निकले।

सीढ़ियाँ उतरकर सड़क पर आए।

चुपचाप कुछ गलियाँ पार कीं।

बार-बार पीछे मुड़कर देखते रहे — कोई पीछा तो नहीं कर रहा।

एक पुरानी कार सड़क के किनारे अंधेरे में खड़ी थी।

दोनों अंदर बैठ गए।

जोगी ने इग्निशन घुमाया।

इंजन घरघराया।

लेकिन जोगी का गाड़ी चलाने का मन नहीं था।

उसके हाथ स्टीयरिंग पर कस गए।

“उस नवीना के घर जाकर उसकी गर्दन क्यों न तोड़ दें?”

अनीश शांत स्वर में बोला—

“अगर उसने इतनी बेरहमी से क़त्ल किया है…

और उसे सज़ा का डर नहीं है…

तो वो अकेली नहीं है।”

एक पल रुका।

“उसके तार कहीं न कहीं त्रिकोण या किसी बड़े गैंग से जुड़े हैं।”

“और ऐसे लोग बिना सुरक्षा के नहीं रहते।”

जोगी ने दाँत भींचे।

“लेकिन—”

तभी—

टुन।

दोनों के फोन एक साथ बज उठे।

अनीश और जोगी ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

जेब से फोन निकाले।

स्क्रीन पर वही नोटिफिकेशन चमक रहा था—

Encrypted Message — Zeroin

अनीश ने मैसेज खोला।

स्क्रीन पर सिर्फ दो वाक्य थे—

“छेदीपुरा गाँव।

लड़कियाँ ज़िंदा हैं।”

कुछ सेकंड तक कार के भीतर सन्नाटा रहा।

जोगी की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं।

“तो… बस वाला हादसा…”

अनीश ने धीरे से कहा—

“हादसा नहीं था।”

उसने फोन बंद किया।

आँखें संकरी हो गईं।

“ज़ेरोइन से मिलना होगा।”

अनीश और जोगी को गए करीब पंद्रह मिनट हो चुके थे।

फ्लैट के अंदर घबराहट की खामोशी थी।

विमला ने जल्दी-जल्दी जीन्स और शर्ट पहन ली।

अलमारी से एक छोटा बैग निकाला।

कुछ कपड़े, पैसे, कागज़ — जो हाथ लगा, ठूँसती चली गई।

बैग बंद किया।

दरवाज़ा खोला।

और बिना पीछे देखे बाहर निकल गई।

सीढ़ियाँ उतरते हुए उसके कदम तेज़ थे।

दिल अभी भी जोर से धड़क रहा था।

नीचे से उसी वक्त एक आदमी ऊपर चढ़ता दिखाई दिया।

साधारण कपड़े।

चेहरा लगभग छाया में।

विमला ने एक पल उसे देखा।

फिर नज़र झुका ली।

साइड से निकलने लगी।

अचानक— आदमी बिजली की फुर्ती से आगे बढ़ा।

हाथ में चमकता हुआ चाकू।

एक ही झटके में उसने चाकू विमला के पेट में उतार दिया।

दूसरे हाथ से उसका मुँह कसकर दबा दिया।

विमला की आँखें फैल गईं।

उसका शरीर कुछ पल तड़पा।

हाथ हवा में छटपटाए।

फिर धीरे-धीरे ढीले पड़ गए।

आदमी ने चाकू खींचा।

विमला का शरीर सीढ़ियों के किनारे लुढ़क गया।

उसने उसे वहीं किनारे लिटा दिया।

विमला की आँखें खुली रह गई थीं।

मुँह से बहता खून ठोड़ी तक आकर ठहर गया था।

सीढ़ियों के अंधेरे में उसका शरीर अब बिल्कुल निशब्द पड़ा था।

आदमी एक पल उसे देखता रहा।

फिर चुपचाप ऊपर की ओर बढ़ गया।


— जारी —

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