शहर की सड़कें चौड़ी थीं।
पेड़ों की कतारें।
साफ़ फुटपाथ।
ऊँची दीवारों के पीछे खामोश बंगले।
वर्षा की टैक्सी एक बड़े, सफ़ेद पत्थर के फाटक के सामने रुकी।
ऊपर तांबे की नेमप्लेट।
अपराजिता लढवान
सांसद
सुरक्षा कड़ी थी।
दो गार्ड।
एक मेटल डिटेक्टर।
अंदर CCTV.
“किससे मिलना है?” गार्ड ने पूछा।
“सांसद जी से,” वर्षा ने शांत स्वर में कहा।
“अपॉइंटमेंट है?”
“नहीं।”
गार्ड ने सिर हिलाया।
“गाड़ी लौटा लीजिए मैडम, बिना अपॉइंटमेंट नहीं मिल सकते।”
वर्षा ने बिना बहस किए फोन निकाला।
स्क्रीन खोली।
वीडियो चलाया।
गार्ड की आँखें फैल गईं।
स्क्रीन पर —
राज लढवान कुर्सी से बँधा।
खून।
पीछे मोमबत्तियाँ।
गार्ड के होंठ सूख गए।
“ये… ये कहाँ है?”
वर्षा ने सिर्फ़ इतना कहा—
“अंदर खबर भेजो।”
पाँच मिनट बाद—
वर्षा एक आलीशान ड्रॉइंग रूम में बैठी थी।
ऊँची छत।
क्रिस्टल का झूमर।
दीवारों पर तेलचित्र।
महँगा कालीन।
सब कुछ व्यवस्थित।
संस्कारी।
सेंटर टेबल पर काले पत्थर की एक छोटी-सी सजावटी वस्तु रखी थी।
उसकी तीन धारें नीचे जाकर एक बिंदु पर ठहरती थीं।
वर्षा की नज़र एक पल को उस पर अटकी।
तभी दरवाज़ा खुला।
अपराजिता लढवान अंदर आईं।
हल्की डिज़ाइन की क्रीम रंग की सूती साड़ी।
ऊपर भूरे रंग का स्वेटर।
सफ़ेद बाल सधे हुए।
आँखों पर चश्मा।
मांग में हल्का सिंदूर।
चेहरे पर स्थिर मुस्कान।
हाथ नमस्कार मुद्रा में जुड़े।
वर्षा आधी खड़ी हुई।
“अरे, बैठो बैठो बेटा,” अपराजिता ने हाथ से इशारा किया।
आवाज़ में अपनापन।
गर्मी।
“कुछ लोगी? चाय? कॉफ़ी?”
“जी… चाय ठीक रहेगी।”
अपराजिता ने उँगलियों से हल्की चुटकी बजाई।
नौकरानी लगभग दौड़ती हुई अंदर गई।
अपराजिता सामने सोफ़े पर बैठीं।
हाथ गोद में रखे।
सीधी नज़र वर्षा पर।
हल्की मुस्कान।
“तो बताओ बेटा…”
एक छोटा विराम।
“कहाँ छिपा रखा है मेरे बच्चे को तुम लोगों ने?”
कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।
वर्षा ने महसूस किया—
यह महिला घबराई नहीं है।
न नाराज़।
न चिंतित।
उसके लिए मानो ये सब एक खेल है।
—
उधर — गाँव की कोठी
बाहर सायरन की आवाज़ अब साफ़ सुनाई दे रही थी।
पहले दूर।
फिर पास।
फिर और पास।
हॉल में मोमबत्तियाँ आधी पिघल चुकी थीं।
फर्श पर जमी मोम और कुचली जलेबियाँ चिपचिपी हो गई थीं।
जोगी खिड़की के पास गया।
दूर सड़क पर लाल-नीली बत्तियाँ चमकती दिखीं।
“अनीश जी… अब क्या होगा?”
अनीश कुर्सी पर बैठा था।
पसीने और धूल से सना।
कमीज़ फटी हुई।
हाथ में सिगरेट।
उसने लंबा कश लिया।
धुआँ छोड़ा।
“घबरा मत, फौजी,”
वह शांत स्वर में बोला।
“पुलिस में नहीं हूँ तो क्या…
वहाँ अभी भी अपनी चलती है।”
जोगी ने भौंहें सिकोड़कर देखा।
अनीश हल्का मुस्कुराया।
“जो पार्टी आ रही है, उसे लीड कर रहा है — संभावित सिंह।
मेरा ही शागिर्द है।
हमारा ख़याल रखेगा।”
जोगी के चेहरे पर हल्की राहत आई।
“तो सब ठीक रहेगा?”
अनीश ने राख झाड़ी।
“बस औपचारिकता होगी।
राज को उठाएँगे।
बाकी मैं देख लूँगा।”
पीछे कुर्सी से बँधा राज हँस रहा था।
धीरे-धीरे।
“तुम्हें लग रहा है बच जाओगे?
अरे काटे जाओगे तुम सब…”
सायरन अब बिल्कुल फाटक पर था।
—
इधर — शहर का ड्रॉइंग रूम
क्रिस्टल झूमर की रोशनी में अपराजिता लढवान की मुस्कान स्थिर थी।
नौकरानी चाय रखकर चली गई।
अपराजिता ने कप उठाया।
धीरे से घूँट लिया।
कई वर्षों की राजनीति ने उन्हें घंटों तक बिना पलक झपकाए मुस्कुराना सिखाया था।
वर्षा ने चाय के कप को हाथ भी नहीं लगाया।
अपराजिता ने कप नीचे रखा।
“मेरा बेटा… मेरा राज…”
वह हल्की मुस्कान के साथ बोलीं, “दरअसल लोग उसे समझ नहीं पाए।”
वर्षा के भीतर कुछ उबल पड़ा।
“वो समझने लायक नहीं है। वो एक हैवान है।”
पहली बार अपराजिता के चेहरे पर हल्की शिकन आई।
“उसकी करतूतें—” वर्षा का स्वर काँप उठा।
“श।”
अपराजिता ने होंठों पर उँगली रखी।
कमरे की हवा बदल गई।
वर्षा अनायास चुप हो गई।
अपराजिता ने मेज़ पर रखा छोटा नोटपैड उठाया।
कुछ लिखा।
कागज़ उसकी ओर बढ़ाया।
वर्षा ने पढ़ा—
“स्टिंग करने आई हो? वायर तो नहीं पहनी?”
वर्षा ने तुरंत सिर उठाया।
“नहीं।”
उसका जवाब ज़ोर से निकला।
थोड़ा ज़्यादा ज़ोर से।
अपराजिता फिर मुस्कुराईं।
“तुमने सौना बाथ लिया है कभी?”
“हाँ… यूरोप में एक बार… लेकिन—”
वर्षा रुक गई।
यह बातचीत अब अजीब दिशा ले रही थी।
अपराजिता धीरे से उठीं।
“रुको।
हम इंतज़ाम करवा के आते हैं।”
वह बाहर चली गईं।
दरवाज़ा बंद।
वर्षा सोफ़े पर बैठी रह गई।
“चाहती क्या है ये औरत…”
वह बुदबुदाई।
तभी फोन चमका।
जोगी का मैसेज।
“Everything under control.”
वर्षा ने राहत की साँस ली।
उसे नहीं पता था—
कि इस खेल में
सबसे खतरनाक चाल
अभी चली जानी बाकी थी।
—
उधर कोठी का फाटक टूट चुका था।
पुलिस की गाड़ियाँ आँगन में घुस आईं।
लाल-नीली बत्तियाँ दीवारों पर झिलमिला रही थीं।
दरवाज़े धड़ाधड़ खुले।
हथियारबंद जवान अंदर घुसे।
चेहरे सख़्त।
आवाज़ें तेज़।
अनीश, जोगी और उनके दो साथी चुपचाप हॉल में खड़े रहे।
कुछ ही सेकंड में पुलिस वाले चींटियों की तरह पूरे मकान में फैल गए।
“क्लियर करो!”
“ऊपर देखो!”
“पीछे का हिस्सा चेक करो!”
हॉल में खड़े अनीश ने सिगरेट का आख़िरी कश लिया और बुझा दिया।
दरवाज़े से एक जवान अफ़सर अंदर आया।
तीस-बत्तीस साल का।
चेहरे पर तेज़।
कंधों पर नई-सी चमकती स्टार।
सब-इंस्पेक्टर संभावित सिंह।
उसने अंदर आते ही अनीश को देखा।
एक पल के लिए उसकी आँखों में पुराना अपनापन चमका।
वह सीधा खड़ा हुआ।
सैल्यूट।
“सर।”
अनीश ने हल्की मुस्कान दी।
“अरे संभावित सिंह।”
अगले ही पल संभावित झुका —
जैसे पैर छूने वाला हो।
अनीश ने तुरंत उसे बाँहों में भर लिया।
“बस बस… अरे तेरी तो दाढ़ी-मूँछ उग आई!
पुलिस अकादमी से निकला ही था जब हमारी टीम ज्वाइन की थी।”
दोनों हल्के से हँसे।
कुछ सेकंड के लिए हॉल का तनाव कम-सा लगा।
राज कुर्सी से बँधा देख रहा था।
मुस्कान अब भी उसके चेहरे पर थी।
संभावित थोड़ा औपचारिक हुआ।
“सर… एक बात कहनी थी।”
“हूँ?”
“आप लोगों के मोबाइल और हथियार…
हमें सबूत के तौर पर ज़ब्त करने होंगे।”
हल्की-सी झिझक।
“Sorry sir… प्रोटोकॉल है।”
अनीश ने बिना हिचक हाथ बढ़ा दिया।
“अरे ले ले यार।
प्रोटोकॉल पूरा फॉलो कर।”
जोगी ने भी अपना फोन और गन सौंप दी।
दोनों पुराने पुलिसवालों ने भी।
एक हवलदार ने सब बैग में डाल लिया।
दो सिपाही आगे बढ़े।
कुर्सी से जकड़े राज के बंधन खोलकर खड़ा किया।
राज लड़खड़ाया।
फिर सीधा हुआ।
संभावित ने उसे देखा।
एक सेकंड।
आँखों में हल्की-सी सख़्ती।
“ले जाओ साले को।”
दो सिपाही उसे पकड़कर बाहर ले गए।
राज जाते-जाते अनीश की तरफ़ देख रहा था।
उसकी मुस्कान बरकरार थी।
संभावित ने मुस्कुराकर अनीश की तरफ़ देखा।
“आइए सर।
पहले आपकी मरहम-पट्टी करवाते हैं।
फिर नाश्ता भी करवा देते हैं।”
“देखा?” अनीश ने जोगी की तरफ़ मुस्कुराकर कहा।
“कहा था न… अपना ही लड़का है।”
जोगी भी हल्का मुस्कुराया।
चारों धीरे-धीरे बाहर निकलने लगे।
अनीश — “घिरदयाल के समोसे तो नहीं ले आया।”
संभावित — “वही लाया हूँ सर, पुलिस स्टेशन के सामने वाले।”
हँसी और ठहाकों के बीच चारों पुलिस की लंबी वैन में बैठे।
आँगन में पुलिस की हलचल थी।
धीरे-धीरे गाड़ियाँ निकलने लगी।
पर हवा में कुछ और भी था।
कुछ जो अभी दिख नहीं रहा था।
— जारी —