अनीश के जबड़े कस गए थे।
दाँत ऐसे भींचे जैसे टूट जाएँगे।
“ये विग वाला हरामी… राज लढवान… इसका नाम कई फाइलों में था,”
उसने धीरे कहा।
“पर कभी ठोस लिंक नहीं मिला।”
वह उठा।
राइफल हाथ में ले ली।
“मैंने इसे एक बिगड़ा अमीरज़ादा समझ कर छोड़ दिया था। गलती की।”
वर्षा एक कदम पीछे हटी।
उसने पहली बार अनीश को कंट्रोल खोते देखा।
जोगी शांत स्वर में बोला—
“अनीश जी… मान लीजिए कि ये वही है… तो भी ढूँढेंगे कैसे?”
अनीश हँसा।
सूखी, खतरनाक हँसी।
“इसी इलाके में है ये लढवान।
इसी गाँव के बाहर।
उसकी माँ—अपराजिता लढवान। बड़ी नेता।
पुलिस प्रशासन सब उसकी जेब में है।
मानसिक बीमारी का बहाना बना कर सालों से छिपा रखा है उसे।”
वह जल्दी-जल्दी एक बस्ता भरने लगा।
पानी की बोतल।
रस्सी।
कुछ गोलियों से भरी मैगज़ीन।
छोटा मेडिकल किट।
“आज खत्म करूँगा उसे।”
जोगी भी खड़ा हो गया।
जैकेट हल्की खोली। अंदर की गन दिखी।
“मैं भी चलूँगा।”
अनीश ने उसे गौर से देखा।
“फौजी है तू। काम आएगा।”
फिर वर्षा की तरफ़ देखा।
“तू यहाँ से निकल। बस स्टैंड छोड़ देंगे।”
वर्षा ने सिर हिलाया — पर आँखें नहीं झुकीं।
जोगी से बोली, “जोगी जो भी हो मुझे खबर करते रहना।
ये स्टोरी अगर मेरे हाथ से निकली,
तो किसी और रिपोर्टर के हाथ लग जाएगी।”
जोगी ने सर हिलाया।
अनीश ने तंज़ कसा, “इसकी टीआरपी वाली आत्मा जाग उठी।”
तभी बाहर कुत्ते के भौंकने की आवाज़।
अनीश एकदम खिड़की तक गया।
परदे के कोने से झाँका।
चेहरा बदल गया।
“साले… तुम लोगों के पीछे यहाँ तक आ पहुंचे हैं ये।”
घर के बाहर हल्की हलचल थी।
अनीश तुरंत दरवाज़ा खोला।
कुत्ता अंदर घुसा।
दरवाज़ा बंद।
“बेसमेंट में चलो सब। अभी।”
—
बाहर।
शाम उतर चुकी थी।
चार दिशाओं से साये घर की ओर बढ़ रहे थे।
हाथों में महंगे हथियार।
नपी-तुली चाल।
यह गाँव के गुंडे नहीं थे।
प्रशिक्षित कमांडो थे।
दरवाज़े पर धातु का भारी सिलिंडर टकराया।
लकड़ी टूटी।
दो गैस कैनिस्टर अंदर फेंके गए।
“Move!”
टीम के सदस्य तड़-तड़ अंदर घुसने लगे—
कमरा दर कमरा तलाशी होने लगी।
उसी समय
घर से कुछ मीटर दूर
घास के बीच छिपा एक लोहे का ढक्कन खिसका।
नीचे से एक संकरी सुरंग का रैंप।
एक बख़्तरबंद SUV बाहर निकली।
ड्राइविंग सीट — अनीश।
बगल में — जोगी।
पीछे — वर्षा और कुत्ता।
“सीट बेल्ट बाँध!” अनीश चिल्लाया।
गाड़ी तेज़ी से उछली।
कंकड़ उड़े।
पीछे से गोलियों की आवाज़ें।
धड़धड़।
SUV के पिछले हिस्से पर स्पार्क्स।
अनीश ने डैशबोर्ड से एक छोटा रिमोट उठाया।
जोगी ने देखा।
“ये क्या—”
लाल बटन दबा।
धमाका।
एक गहरी कंपन।
फिर—
घर के अंदर से विस्फोट।
छत ऊपर उछली।
दरवाज़े खिड़कियों ने आग उगली।
पत्थर बिखरे।
आग की लपटें।
दीवारों में दबा बारूद इग्नाइट हो चुका था।
दो कमांडो बाहर भागते दिखे —
आग की लपटों से घिरे।
चीख नहीं — सिर्फ़ हरकत।
SUV मोड़ पर चढ़ चुकी थी।
रियर-व्यू मिरर में
जलता हुआ मकान।
धुएँ में घुलती परछाइयाँ।
अनीश हँसा नहीं। बस भारी साँस ले रहा था।
“मेरे घर में मुझे मारने आये थे साले…”
जोगी मिरर देखता रहा।
वर्षा का दिल तेज़ धड़क रहा था।
फिर खुद को समझाया, “इनकी पास बंदूकों की ताकत है, और मेरे पास कलम की।”
पर ये तो तय था कि यह अब एक तफ़्तीश नहीं रही थी।
यह युद्ध था, जहाँ उसे जोगी और अनीश जैसे सैनिकों की ज़रूरत थी।
—
सुबह की धूप बस-स्टैंड की टूटी बेंचों पर तिरछी पड़ रही थी।
वर्षा ने बैग कंधे पर टाँगा।
अनीश और जोगी उसे ठीक आधा घंटा पहले यहाँ छोड़ गए थे।
पर उसे लगा — जैसे कई घंटे बीत चुके हों।
“लॉज में कुछ रह तो नहीं गया?”
दिमाग़ उसी चक्कर में फँसा था।
जल्दी में निकलना पड़ा था।
कुछ और मिनट।
फिर बस आई।
खटारा।
ड्राइवर बीड़ी सुलगा रहा था।
कंडक्टर आधी नींद में टिकट फाड़ रहा था।
वर्षा खिड़की वाली सीट पर बैठ गई।
फोन जेब में कंपन हुआ।
जोगी का मैसेज।
“हम पहुँच गए हैं। अंदर जाने से पहले आखिरी चेक कर रहे हैं।”
वर्षा ने स्क्रीन कुछ सेकंड देखा।
टाइप करने लगी—
फिर डिलीट कर दिया।
कोई जवाब नहीं।
बस चल पड़ी।
गाँव पीछे छूटता गया।
कच्ची सड़क।
सूखे खेत।
धूल।
उसकी उँगलियाँ बैग की चेन कसकर पकड़े थीं।
फोन फिर बजा।
इस बार फोटो।
ऊँचा फाटक।
अंदर सफ़ेद महँगी SUV.
वर्षा की साँस थोड़ी गहरी हुई।
बस मोड़ काटकर मुख्य सड़क पर आ गई।
उसने शीशे में अपना धुँधला प्रतिबिंब देखा।
धीरे से बुदबुदाई—
“अब पीछे नहीं हट सकते।”
—
कुछ किलोमीटर दूर
कबलोई से बाहर, ऊँची झाड़ियों के पीछे।
अनीश।
जोगी।
दो पुराने पुलिसवाले।
चेहरे सख़्त।
बात कम।
सामने — अपराजिता लढवान की कोठी।
ऊँची दीवार।
लोहे का फाटक।
अंदर सफ़ेद SUV.
गेट पर दो लठैत।
डंडे हाथ में।
गप्पें मारते हुए।
न वॉकी-टॉकी।
न कोई पेशेवर सुरक्षा।
अनीश ने दूरबीन हटाई।
“बहुत ज़्यादा चौकसी नहीं है,”
धीमे स्वर में बोला।
“या इन्हें लगता है कि कोई आएगा ही नहीं।”
जोगी ने पूछा—
“अंदर कितने लोग होंगे?”
“राज लढवान।
दो-तीन नौकर।
उसकी माँ ज़्यादातर शहर में रहती है।”
एक पल की चुप्पी।
सूखी घास की गंध हवा में तैर रही थी।
अनीश ने ज़मीन पर लकड़ी से नक्शा-सा बनाया।
“पीछे की दीवार नीची है।
यहाँ से घुसेंगे।
गार्ड मिला तो चुपचाप हटाओ।
गोली — आखिरी विकल्प।
शोर नहीं।”
दोनों पुराने पुलिसवाले सिर हिलाते हैं।
जोगी ने फोन देखा।
सिग्नल कमजोर।
उसने कैमरा ऑन किया।
जेब में रख लिया।
“रिकॉर्डिंग चालू रहेगी।”
अनीश ने उसे देखा। आँखों में अजीब-सा ठंडा निश्चय।
“आज या तो हम सच लेकर निकलेंगे… या कोई नहीं निकलेगा।” हाथ का इशारा किया। “चलो।”
चारों धीरे-धीरे उठे।
रिकॉन हो चुका था।
अब कार्रवाई का समय था।
चार परछाइयाँ झाड़ियों में घुल गईं।
उन्हें अंदाज़ा नहीं था — अंदर सिर्फ़ एक घर नहीं, एक नर्क उनका इंतज़ार कर रहा था।
— जारी —
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