छोटा कमरा।
कैमरा ट्राइपॉड पर।
लाइट तीखी।
कोई एंकर नहीं।
कोई डिबेट नहीं।
बस सीधा कैमरा।
वर्षा कुर्सी पर बैठी है।
दो टेक हो चुके हैं।
तीसरे टेक से पहले की चुप्पी।
वर्षा के मन में एक विचार आया।
“ये आख़िरी बार है जब मैं सच बोल सकती हूँ।
इसके बाद लौटना मुमकिन नहीं होगा।”
अब वो रिकॉर्ड बटन की तरफ़ देखती है।
और बोलना शुरू करती है।
आवाज़ हल्की काँपती है — लेकिन शब्द साफ़।
रूकती है, बोलती है, आँसू पोंछती है।
एक जगह वो अटकती है।
फिर खुद ही रिपीट करती है।
और अंत में चुप हो जाती है।
—
कुछ घंटों बाद
जोगी को होश आया।
पहले बदबू महसूस हुई।
फिर दर्द।
फिर आवाज़ें।
धीरे-धीरे आँखें खुलीं।
कबलोई की एक संकरी गली।
धूल।
कचरा।
दीवारों पर फीके पोस्टर।
वह ज़मीन पर पड़ा था।
सिर्फ़ चड्डी पहने।
माथे पर सूखा खून।
सूजा चेहरा।
दाहिने हाथ में कुछ दबा था।
एक छोटी बच्ची की मुचड़ी हुई फ्रॉक।
उसने उसे देखा।
पहचाना नहीं।
याद करने की कोशिश की।
सिर में हथौड़े चलने लगे।
शरीर के हर जोड़ में दर्द।
कुछ बच्चे उसके आसपास बैठे थे।
घूर रहे थे।
“ये वही है क्या?”
एक ने फुसफुसाया।
“हाँ वही… टीवी वाला…”
दूसरे ने कहा।
पास के घर में टीवी चल रहा था।
एंकर की आवाज़ गली में फैल रही थी।
“इस दरिंदे के भोले चेहरे पर मत जाइएगा दोस्तों!”
एंकर प्रशांत लगभग चीख रहा था।
“इसी ने न जाने कितनी मासूम बच्चियों को अगवा किया और मार डाला!”
स्क्रीन पर जोगी की तस्वीर।
धुंधली फुटेज।
जंगल।
जलेबी के दोने।
मोमबत्तियाँ।
खून के छींटे।
एंकर गरजा, “यही है वो — कबलोई गाँव का तथाकथित ‘भूत’! और आइये अब सुनते हैं इस ज़ालिम की एक विक्टिम से।”
सीन तुरंत बदला।
रोती हुई वर्षा।
नीचे टिकर — विक्टिम: वर्षा मलिक।
“जोगिंदर सांगवान ने… खुद मुझे… अपनी हैवानियत के किस्से बताए…
और फिर… मेरे साथ भी…”
वह रो पड़ी।
पीछे से एंकर की आवाज़, “और आइये अब चलते हैं इलाके की सांसद श्रीमती लढवान की लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस में।”
सीन फिर बदला।
अपराजिता लढवान एक मंच पर। माइक के सामने।
“देखिये बैठ जाइये।
उधर ... आप लोग शांत हो जाइए।
प्लीज़।
देखिए, पुलिस की टीमें लगी हुई हैं।
ये दरिंदा बख्शा नहीं जाएगा।
ये एक माँ का वादा है।”
टीवी की आवाज़ हवा में तैर रही थी।
जोगी दीवार का सहारा लेकर उठने लगा।
चक्कर।
उसे घूरते हर इंसान के हाथ में मोबाइल था।
हर स्क्रीन पर वही चेहरा।
उसका चेहरा।
पीछे से आवाज़ आई—
“यही है साला!”
एक पत्थर आकर उसके कंधे पर लगा।
फिर दूसरा।
सड़े टमाटर।
औरतें गालियाँ देती हुईं।
एक आदमी फावड़ा उठाए आगे बढ़ा।
“मारो!”
भीड़ बढ़ती गई।
जोगी ने एक पल चारों तरफ देखा।
कुछ समझ नहीं आ रहा था।
बस एक बात साफ़ थी — भागना होगा।
वह लड़खड़ाता हुआ दौड़ा।
भीड़ पीछे।
लाठियाँ।
फावड़े।
जूते।
गली दर गली उसका पीछा हुआ।
चौराहे पर उसे घेर लिया गया।
पहला घूँसा।
फिर लात।
फिर जूते।
वह गिर पड़ा।
फ्रॉक अब भी उसके हाथ में थी।
“जला दो इसे!”
किसी ने बाल पकड़कर उसका सिर उठाया।
“देखो! यही है वो भूत!”
जूते।
घूँसे।
खून।
और कैमरे।
हर वार रिकॉर्ड हो रहा था।
जोगी की आँखें खुली थीं।
पर उनमें अब कोई समझ नहीं थी।
सिर्फ़ एक सवाल— मेरे साथ क्यों?
तभी— मोटरसाइकिल की घरघराहट।
फिर गोलियों की तड़तड़ाहट।
भीड़ चीखती हुई तितर-बितर हो गई।
एक मोटरसाइकिल भीड़ चीरती हुई आई।
सवार के एक हाथ में विदेशी हैंडगन।
रुक-रुक कर आग उगलती।
चेहरा गमछे में लिपटा।
तेज़ ब्रेक।
सवार ने जोगी की बाज़ू पकड़ी।
“बैठ!”
जोगी आधी बेहोशी में पीछे लटक गया।
बाइक तेज़ी से निकल गई।
एक-दो लोगों ने पीछा किया। “अब रुक।”
लाठियाँ भांजी।
पर सवार बचता निकाल ले गया।
गाँव पीछे छूट गया।
पक्की सड़क।
हवा।
सवार ने गमछा उतारा।
अनीश।
“साले,” उसने दाँत भींचे, “तुझे मैं मरने नहीं दूँगा।”
बाइक जंगल की सड़कों में गुम हो चुकी थी।
—
उस शाम टीवी रूम में बैठी वर्षा कॉफ़ी पी रही थी।
लैपटॉप खुला था। रिपोर्ट आधी लिखी हुई।
तभी टीवी पर न्यूज़ फ्लैश हुई।
भागता जोगी।
उसके पीछे भीड़।
मोबाइल फ़ोन की टूटी, हिलती हुई फुटेज।
एंकर की आवाज़ उत्तेजित।
वर्षा ने कप मेज़ पर रखा।
पीछे कुर्सी से टिक गई।
कुछ सेकंड तक बस देखती रही।
भीड़ चिल्ला रही थी — “मारो! पकड़ो!”
स्क्रीन पर शब्द बदले।
“संदिग्ध।”
“साज़िश।”
“चौंकाने वाला खुलासा।”
वर्षा के होंठों पर हल्की-सी रेखा आई — मुस्कान नहीं।
बस एक समझ।
“बस इतना ही।”
उसने सोचा।
“एक बयान।
एक आँसू।
और कहानी पलट जाती है।”
उसने कॉफ़ी का घूँट लिया।
“हीरो को गिराने के लिए गोली नहीं चाहिए… बस भीड़ चाहिए।”
टीवी पर जोगी ठोकर खाकर गिरा।
वर्षा ने स्क्रीन से नज़र हटाई।
लैपटॉप की तरफ़ देखा।
रिपोर्ट की पहली पंक्ति डिलीट की।
नयी लाइन टाइप की।
—
देर रात, शहर के बाहर की एक सुनसान हवाई पट्टी पर हल्की आवाजाही थी।
एक चार्टर्ड जेट में ईंधन भरा जा रहा था।
एक महंगी विदेशी गाड़ी आकर रुकी।
राज लढवान एक भारी बस्ता लिए उतरा और छोटी सीढ़ी चढ़कर अंदर घुसा।
पीछे दो बाउंसर जैसे दिखने वाले मुस्टंडे बॉडीगार्ड।
बैठकर सीट बेल्ट लगाई ही थी कि एयर-होस्टेस आई।
एक लम्बे ग्लास में बबूले उठती महंगी शैम्पेन, साथ में एक हल्की फुलकी श्रिंप की डिश।
राज खिड़की से बाहर देख रहा था।
होस्टेस हल्का झुकी, डीप क्लीवेज दिखाती।
“अगर कुछ और चाहिए हो तो…”
राज की नज़र उसकी खुली ड्रेस पर पड़ी। हँसा।
“बेबी, तुम्हारी उम्र थोड़ी ज़्यादा है।”
होस्टेस चली गई।
राज के फ़ोन पर वीडियो कॉल।
अपराजिता का मुस्कुराता चेहरा — “बैठ गए? पहुँचकर फ़ोन कर देना।”
राज — “ओके मॉम।”
अपराजिता, एक पल रुककर — “और हो सके तो ज़रा खुद पर काबू रखना, विदेश है।”
राज — “You know me, mom.” आँख मारी।
अपराजिता — “ध्यान रखना।”
कॉल कट।
पायलट अनाउंसमेंट करने लगा।
राज अपने फ़ोन में फ़ोटोस स्क्रॉल करने लगा।
—
चार दिन बाद
जोगी को होश आया।
साफ़ कमरा।
मटमैली हरी दीवारें।
ऊपर दो चमकती ट्यूबलाइट।
केमिकल की गंध।
वह नरम बिस्तर पर पड़ा था।
छाती, पेट, सिर — पट्टियों में बंधे।
हाथ में ड्रिप।
पास एक युवती कुर्सी पर बैठी ऊँघ रही थी।
सलवार-सूट में।
वह उठी।
मुस्कुराई।
दरवाज़ा खोलकर बोली —
“मामू?”
जोगी के होंठ हिले।
“पानी…”
अनीश अंदर आया। चेहरे पर राहत।
बोला, “मेरा शेर बच्चा।”
युवती की ओर इशारा किया।
“मेरी भांजी — मालती।
डॉक्टरी पढ़ रही है।
तेरी मरहम-पट्टी इसी ने की।”
मालती ने हाथ जोड़कर नमस्ते किया।
दोनों ने मिलकर जोगी को उठाया।
पानी पिलाया।
कुछ देर चुप्पी।
जोगी ने धीमे से पूछा— “वर्षा?”
अनीश ने मालती को बाहर जाने का इशारा किया।
फोन खोला।
एक वीडियो चलाया।
जोगी को थमा दिया।
खुद पास बैठकर सिगरेट जलाई।
स्क्रीन पर— एंकर।
वर्षा।
अपराजिता।
“राष्ट्रीय स्तर की पत्रकार…”
“साहसी खुलासा…”
“कबलोई कांड का मास्टरमाइंड…”
जोगी की मुट्ठियाँ भींच गईं।
साँस भारी।
उसने फोन एक तरफ़ रख दिया।
रुँधे गले से बोला—
“जिसे बचा रहा था…
वही मेरा इस्तेमाल कर रही थी।”
अनीश की ओर देखा।
“आपने तो कहा ही था…
ये मीडिया वाले किसी के सगे नहीं होते।”
अनीश ने लंबा कश लिया।
धुआँ धीरे से छोड़ा।
“तुझे क्या बोलूँ…”
रुका।
जोगी की तरफ़ देखा।
“मेरा खुद का शागिर्द दग़ा दे गया।”
कमरे में सन्नाटा।
जोगी ने नज़र झुका ली।
“मैंने गलत लड़ाई चुनी।
या शायद सही लड़ाई… गलत लोगों के साथ।”
उसकी आँखों में गुस्सा था।
गले में जो अटक रहा था —
वो चोट का दर्द नहीं,
धोखे का था।
अनीश खिड़की से बाहर देख रहा था।
“अब?” जोगी ने पूछा।
अनीश की आवाज़ ठंडी थी।
“अब हम मरे हुए समझे जाएँगे।”
सिगरेट का धुआँ छोड़ा।
“कुछ दिन ऐसे ही रहेंगे।
शांत। नज़र से दूर।
सिर्फ़ देखेंगे। और सुनेंगे।”
— जारी —