Trikon - 4 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 4 — सुराग

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Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 4 — सुराग

अगली सुबह।

नदी के किनारे हल्की धूप उतर रही थी।

दूर झाड़ियों के पास जोगी की मोटरसाइकिल खड़ी थी।

वर्षा घुटनों के बल बैठी नोट्स ले रही थी।

रेत पर कुछ पुराने निशान थे — आधे मिटे हुए।

जोगी काला चश्मा पहने खड़ा था।

नदी में कंकड़ फेंक रहा था।

हर कंकड़ पानी में गिरकर गोल-गोल लहरें बना रहा था।

वह कभी-कभी पैर से रेत उछाल देता।

वर्षा ने बिना ऊपर देखे पूछा—

“पुलिस को यहाँ से कुछ नहीं मिला?”

जोगी के चेहरे पर एक तंज भरी मुस्कान उभरी।

“दस-दस गाँव पर एक थाना है,” वह बोला।

“पुलिस यहाँ कुछ नहीं करती।”

वह एक और कंकड़ फेंकता है।

“दो केसों में… शायद तीन में… लड़कियों के कपड़ों से थोड़ी दूर… एक पत्तों से बना दोना भी मिला था, उसमें आधी खाई जलेबी।”

वर्षा का हाथ रुक जाता है।

उसके दिमाग में टीवी वाली तस्वीर कौंधती है।

हलवाई की दुकान।

दो नन्ही बच्चियाँ।

हाथ में मिठाई।

सब कुछ अचानक जुड़ने लगता है।

वह गहरी साँस लेती है।

“ये तो बहुत एहम सुराग है। उस मिठाई के दोने का ज़िक्र किसी पुलिस रिपोर्ट में तो नहीं है,” वह धीरे से कहती है।

जोगी हँसता है — बिना खुशी के।

“रिपोर्ट लिख ली गई मैडम, वही बड़ी बात है।

मीडिया का दबाव है तो थोड़ी हलचल है।

वरना पुलिस के लिए ये सब केस… बस सिरदर्द हैं।”

वर्षा चुप हो जाती है।

हवा में नमी और रेत की गंध है।

अचानक जोगी दूर की ओर इशारा करता है।

“देखो।”

नदी के उस पार झाड़ियों के बीच से धुआँ उठ रहा था।

दोनों उधर बढ़ते हैं।

करीब पहुँचते ही मंत्रोच्चार की धीमी आवाज़ सुनाई देती है।

झाड़ियों के बीच एक छोटा-सा घेरा बना है।

बीच में राख।

कुछ नींबू।

लाल कपड़ा।

अगरबत्ती।

ओझा बैठा है।

आँखें बंद।

हाथ में राख मलता हुआ।

उन्हें देखते ही उसकी आँखें खुलती हैं।

एक पल के लिए तीनों की नज़रें मिलती हैं।

फिर ओझा झट से उठता है।

कपड़ा समेटे बिना ही जंगल की तरफ़ भाग जाता है।

कुछ सेकंड में झाड़ियों के पीछे गायब।

वर्षा राख के पास झुकती है।

वहाँ जले हुए कागज़ के टुकड़े हैं।

एक आधा जला हुआ कागज़, वही जिसमें मिठाई लिपटी जाती है।

वह उसे उठाती है।

रेत झाड़ती है।

फिर कागज़ को पलटती है।

जले हुए किनारे के बीच बची स्याही में एक आकृति साफ़ दिखती है—

छोटा-सा उल्टा त्रिकोण।

उसके भीतर तीन टेढ़ी रेखाएँ।

जैसे कोई मुहर रही हो।

वर्षा की आँखें सिकुड़ जाती हैं।

जोगी पास खड़ा है।

“भूत का काम नहीं है,”

वह धीरे से कहता है।

वर्षा ने कागज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया।

“नहीं,” वह लगभग फुसफुसाई,

“किसी ने भूत की कहानी गढ़ी है।”

जोगी ने निशान को गौर से देखा।

“ये ओझा का नहीं लगता।”

“नहीं,” वर्षा बोली,

“ये खेल ओझा से बड़ा है।”

नदी का पानी बहता रहता है।

दूर धुआँ अब हल्का हो चुका है।

और हवा में मीठी-सी गंध रह गई है।

दोनों बाइक के पास लौटते हैं।

वर्षा उधेड़बुन में—

“पिछले सात साल में लगभग सत्रह केस हुए हैं… है न?”

जोगी हेलमेट पहनते हुए— “और भी ज़्यादा। सब मीडिया में नहीं आते।”

“इनमें से अगर एक भी लड़की ज़िंदा मिली होती…”

“मिली थी,” जोगी बीच में बोलता है।

“चितरंजन जी की बेटी सरोज।

बहुत बुरी हालत में मिली थी।

हॉस्पिटल में एक दिन ज़िंदा रही… फिर।”

वर्षा रुकती है।

“उसने कुछ बताया?”

जोगी धीमे स्वर में— “पता नहीं।

उसके घरवाले अब दूसरे गाँव में रहते हैं।

सवालों से दूर।”

तभी झाड़ियों में हल्की आहट।

पत्ते हिलते हैं।

जोगी का हाथ तुरंत जैकेट के अंदर जाता है —

कंधे से स्ट्रैप की हुई बंदूक पर।

वर्षा सहमकर उसके पीछे हो जाती है।

कुछ सेकंड।

सन्नाटा।

फिर हवा।

जोगी धीमे स्वर में— “यहाँ से चलना चाहिए।”

वर्षा पीछे बैठ जाती है।

“जोगी, मुझे सरोज के माँ-बाप से मिलना है।”

“अभी?”

“I feel… we don’t have a lot of time.”

बाइक स्टार्ट होती है।

अगले कुछ घंटों तक वे लगातार चलते रहे, बीच में बस कुछ चाय नाश्ते के लिए रुके।

पूछते-पूछाते चितरंजन जी के घर पहुँचे।

रिपोर्टर सुनते ही पहले तो चितरंजन भड़क उठे, “निकलों यहाँ से।”

पर जोगी ने उन्हें अपना वास्ता देकर मना लिया।

पुराने दिनों की हल्की जान-पहचान रही थी।

दरवाज़ा खुला।

अंदर चाय आई।

कमरे में भारी चुप्पी।

वर्षा ने सीधा सवाल किया— “जब सरोज अस्पताल में थी… उसने कुछ बताया था?”

सरोज की माँ का चेहरा टूट गया।

वह आँसू रोक नहीं पाई।

अंदर चली गई।

चितरंजन धीमे स्वर में— “कुछ कहा था…

पर वो होश में नहीं थी।”

“क्या कहा?”

लंबा विराम।

चितरंजन जी का गला मानों सूख गया।

“हमने पूछा… पुलिस ने पूछा…

कौन लोग ले गए थे उसे?”

उनकी आवाज़ काँपती है।

“वो बोली…

भूत ले गया था।

बड़ी-बड़ी आँखें… लाल बाल… पीले दाँत…”

कमरे में सन्नाटा।

वर्षा धीरे से साँस छोड़ती है। वही भूत-प्रेत की बातें।

चितरंजन ने कुछ देर चुप रहकर चश्मा ठीक किया।

फिर धीमे स्वर में बोले—

“भला हो बेचारे इंस्पेक्टर अनीश का… वही हमारे केस के इंचार्ज थे।”

वर्षा ने तुरंत नाम नोट किया।

“अनीश?” उसने पूछा।

चितरंजन सिर हिलाते हैं।

“हाँ।

अस्पताल में आए थे।

जब सरोज को होश आता-जाता था… वहीं पूछताछ की।”

उनकी आवाज़ भारी हो जाती है।

“बहुत कोशिश की उसने।

रात-रात भर थाने में बैठा रहता था।

इधर-उधर दबिश दी।”

एक लंबा विराम।

“लेकिन…”

चितरंजन चश्मा उतारकर पोंछते हैं।

“एक दिन अनीश जी ने ही कहा—

कबलोई से चले जाओ। दूर।”

वर्षा का पेन रुक जाता है।

“क्यों?”

चितरंजन सीधे उसकी आँखों में नहीं देखते।

“बस इतना कहा— यह मामला ऊपर तक जाता है।

और सबके बस की बात नहीं है।”

फिर रुके।

“एक निशान भी दिखाया था उन्होंने।”

वर्षा और जोगी की नज़रें टकराईं।

“कैसा निशान?”

चितरंजन ने दाँत भींचे, जैसे याद पर ज़ोर डाल रहे हों।

“तीन कोनों वाला… काला-सा…

ठीक-ठीक याद नहीं।”

“उल्टा त्रिकोण?” जोगी के मुँह से सहसा निकला।

चितरंजन ने तुरंत उसकी तरफ़ देखा।

“हाँ… वही। उल्टा।”

उनके चेहरे पर हल्का भय उभर आया।

“बोले थे, जहाँ ये दिखे… उससे दूर रहना।”

कमरे में सन्नाटा।

“तो हमने वो गाँव ही छोड़ दिया और यहाँ बस गए।”

जोगी और वर्षा विदा लेते हैं।

वापसी में तेज़ बारिश शुरू हो जाती है।

सड़क धुंधली।

जोगी बाइक मोड़ देता है।

पास की एक छोटी सराय।

सिर्फ़ एक कमरा खाली।

मटमैली दीवारें।

अजीब पेंटिंग्स।

छोटा-सा बिस्तर।

दो पानी की बोतलें।

जोगी दरवाज़े पर रुकता है।

“आप यहाँ रुकिए, मैडम।

मैं बाहर सोफे पर रह लूँगा।”

वर्षा भीगे कपड़ों में खड़ी है।

“चुप करो,”

वह कहती है।

“सारे कपड़े भीग चुके हैं।

यहीं रहो।”

स्वर में हल्का-सा हक।

जोगी कुछ नहीं कहता।

कमरे में बारिश की आवाज़ भर जाती है।

और बाहर — घुप्प अँधेरा।

कमरे में लगी खटारा इस्त्री ठंडी हो चुकी थी।

आधे गीले, आधे सूखे कपड़े कुर्सी पर फैले थे।

दोनों थके हुए थे। बहुत।

वर्षा चादर को अपने चारों ओर लपेटे बिस्तर पर बैठी थी।

जोगी खिड़की के पास खड़ा था—

बाहर अँधेरे को देखता हुआ।

कमर में बँधा तौलिया।

बारिश की आवाज़ अब दूर हो गई थी।

कमरे में बस पंखे की खरखराहट थी।

वर्षा ने धीरे से कहा— “अगर उस दिन तुम नहीं आते तो वो लोग…”

वाक्य अधूरा रह गया।

जोगी ने मुड़कर देखा।

कुछ कहा नहीं।

वर्षा पास आई। बहुत पास।

कोई योजना नहीं थी।

कोई इरादा नहीं।

बस यह एहसास— कि आज कोई सुरक्षित है।

जोगी ने उसका हाथ नहीं पकड़ा।

वर्षा ने खुद उसका हाथ ढूँढा।

उसके शरीर से लिपटी चादर अब उसके पैरों के पास गिरी पड़ी थी।

जोगी थोड़ा पीछे हटा— “जी—”

“चुप।” वर्षा ने उसके होंठों पर उँगली रख दी।

कमरा बाहर से आती ठंडी हवा और भीतर की गर्म साँसों से भर गया।

कुछ समय बाद।

कमरे में फिर से पंखे की आवाज़ थी।

वर्षा जोगी की बगल में लेटी थी।

दोनों एक ही चादर में लिपटे हुए।

साँसें अब सामान्य थीं।

जोगी छत की तरफ़ देख रहा था।

काफी देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर जोगी बोला—

“मैं आम तौर पर ये किसी को नहीं बताता।”

वर्षा ने सिर घुमाया।

सिर्फ़ सुना।

“मेरे पापा के चचेरे भाई की बेटी थी, दिव्या।”

उसकी आवाज़ में न दुख था, न नमी— सिर्फ़ थकान।

“दूर की बहन थी मेरी।

ज़्यादा बातचीत नहीं थी हमारी।

बस जानता था कि सीधी-साधी, पढ़ने-लिखने वाली बच्ची है।”

एक पल रुकता है।

“एक-दो शादी-ब्याह में देखा था उसे।

नाचते।

हँसते।

ज़िन्दगी जीते हुए।”

उसकी आवाज़ भारी हो जाती है।

“पर जब वो गायब हुई…

तो बहुत सी बातें फैलीं।”

वह साँस लेता है।

“कुछ लोग बोले—भाग गई।

कुछ बोले—भूत।”

हल्की, सूखी हँसी।

“तब पहली बार लगा

कि कुछ बहुत ग़लत है।”

वर्षा धीरे से बोली—

“अब समझी… तुम क्यों इन सबका दर्द समझते हो।”

जोगी का गला रुँध जाता है।

आँखों में नमी उतर आती है।

वर्षा एक मज़बूत आदमी को

अंदर से बहुत टूटा हुआ देखती है।

वह कुछ कहना चाहती है।

फिर रुक जाती है।

जोगी आँखें बंद कर लेता है।

कुछ देर बाद वर्षा हल्की मुस्कान के साथ कहती है—

“अच्छा…

जब मेरा एक्स-बॉयफ्रेंड परेशान होता था न,

तो मैं उसे ऐसे ही चीयर-अप करती थी।”

वह उसके कान के पास फुसफुसाती है।

जोगी अचानक हँस पड़ता है— “नहीं, मुझे ये सब हरकतें नहीं करनी।”

“चलो,” वर्षा उसकी आँखों में देखते हुए कहती है, “हँसे तो सही।”

जोगी फिर खिड़की के बाहर देखने लगता है।

अँधेरा अब उतना घना नहीं लगता।

सुबह हो चुकी थी।

वर्षा बाथरूम से बाहर निकली।

गीले बाल।

चेहरे पर नींद और थकान का मिला-जुला असर।

कमरे में टीवी चालू था।

जोगी रिमोट से चैनल बदल रहा था—

एक के बाद एक।

तेज़।

बेचैन।

उसकी आँखों में

गुस्सा था।

और डर।

वर्षा ने स्क्रीन की तरफ़ देखा।

ब्रेकिंग न्यूज़।

“कबलोई से सटे गाँव में एक और बच्ची गायब।”

वर्षा ठिठक गई।

जोगी ने रिमोट दबाना बंद कर दिया।

कुछ सेकंड —

सिर्फ़ एंकर की आवाज़।

वर्षा ने बिना कुछ कहे अपना कुर्ता ठीक किया।

तेज़ी से बाल बाँधने लगी।

“मैंने कहा था न,”

उसने ठंडे स्वर में कहा,

“हमारे पास वक़्त बहुत कम है।”

जोगी ने उसकी तरफ़ देखा।

उसने अलमारी से गन निकाली।

कंधे पर स्ट्रैप की।

ऊपर से जैकेट पहन ली।

“अब कहाँ, मैडम?”

“अब इंस्पेक्टर अनीश को खोजना होगा।”

जोगी ने हल्का-सा सिर हिलाया।

“अगर कबलोई में हैं…

दो घंटे में पता लगा दूँगा।”

उसने फ़ोन निकाला।

नंबर मिलाया।

बालकनी में चला गया।

वर्षा वहीं खड़ी रही।

एक लंबी, ठंडी साँस।

रात की निकटता

अब कमरे में कहीं नहीं थी।

सिहरन फिर से शरीर में दौड़ी।

टीवी पर एंकर की आवाज़ गूँज रही थी—

और कमरे में एक गहरी, खतरनाक चुप्पी।


— जारी —