दस वर्षीया पारुल दौड़ती जा रही है।
नदी के किनारे-किनारे।
रेत पैरों में चुभ रही है, मगर वह हँस रही है।
बालों में दो चोटियाँ हैं, हरी फ्रॉक हवा में लहरा रही है।
पैरों में न चप्पल हैं, न जूते।
“क्या कर रहे हो, भैया?”
वह पीछे देखकर हँसते-हँसते बोलती है।
“ये कौन-सा खेल है?”
वह दौड़ती रहती है।
“मेरा सर घूम रहा है, भैया,”
उसकी आवाज़ में अब थकान उतर आई है।
“मुझे आराम करना है।”
एक पेड़ के पास पहुँचकर वह लड़खड़ाती है।
घुटनों के बल गिरती है।
फिर वहीं ज़मीन पर लेट जाती है।
“और नहीं, भैया,”
उसकी आवाज़ अब बहुत धीमी है।
“अब और नहीं।”
उसकी आँखें मूँदने लगती हैं।
उसके पास एक परछाईं आकर रुकती है।
—
अगली सुबह गाँव में हाहाकार मचा है।
पारुल की माँ दोनों हाथों में उसकी हरी फ्रॉक पकड़े बैठी है।
कपड़ा मुट्ठियों में मरोड़ा हुआ।
मुँह खुला है, आवाज़ नहीं निकल रही — फिर अचानक निकलती है।
एक लंबी, फटी हुई चीख।
“अरे, कोई मेरी बच्ची को ला दो…”
“भगवान, अब मुझे उठा ले…”
आस-पास औरतें विलाप कर रही हैं।
थोड़ी दूरी पर मर्दों का एक झुंड खड़ा है।
हाथ बँधे हुए।
नज़रें ज़मीन पर।
तभी मोटरसाइकिल की घरघराहट सुनाई देती है।
जोगी पहलवान आता है।
साढ़े छह फुट का शरीर।
गाँठा हुआ बदन।
मोटी गर्दन, कंधों तक आते बाल।
सूती बैंगनी कमीज़, नीचे सफ़ेद धोती, पैरों में डिज़ाइनर जूते।
मोटरसाइकिल से उतरते ही उसकी नज़र पारुल की माँ पर जाती है।
चेहरे पर एक शिकन उभर आती है।
“कोई नहीं आएगा, काकी,”
वह कहता है।
“यहाँ सब नामर्द हो चुके हैं।”
वह घुमाकर गाँववालों को देखता है —
नज़रें भरी हुई, चुभती हुई।
“तो तू मर्दानगी दिखा दे रे, जोगिया पहलवान।”
पास बैठे एक बूढ़े की आवाज़ में तंज है।
जोगी उसकी तरफ़ देखता भी नहीं।
“मैंने तो कहा था,”
वह ऊँची आवाज़ में बोलता है,
“रक्षक दल बनाओ। हम सब पहरा देंगे। पर यहाँ किसी को मोबाइल चलाने से फुर्सत हो तब ना।”
पारुल की माँ की आँखें ऊपर की ओर घूम जाती हैं।
उसके शरीर में झटका आता है — फिट पड़ता है।
वह लगभग बेहोश हो जाती है।
“अरे, कोई डॉक्टर को बुलाओ!”
भीड़ में से कोई चिल्लाता है।
तभी एक ओझा चलता हुआ आता है।
सिर पर जटाएँ।
चेहरे और शरीर पर भभूत।
हाथ में डंडा।
“अरे, भूत ले गया है बच्ची को,”
वह ऐलान करता है।
“निशाचर है।
रात में अनुष्ठान करना होगा।”
जोगी भड़क जाता है।
“अबे ओ, आ गया अपनी दुकान चलाने? ये भूत नहीं, इंसान का काम है।
चल निकल यहाँ से, नहीं तो मुँह तोड़ दूँगा।”
ओझा डरता है, मगर जाते-जाते आँखें तरेरता है।
“श्राप दे देंगे, बच्चा।”
जोगी सूखी हँसी हँसता है।
“हाँ, दे ना।”
दूर से सायरन की आवाज़ आती है।
जोगी बुदबुदाता है,
“लो, आ गए तफ्तीश करने वाले।”
—
दो दिन बाद, मुंबई।
एक बड़े न्यूज़ चैनल का हेड ऑफिस।
रिपोर्टर वर्षा मलिक।
अपने केबिन में दीवार से टिक कर सिगरेट पी रही है।
छोटे कटे बाल।
हल्का मेक-अप।
लाल कुर्ती, नीचे डेनिम जीन्स।
सामने बड़े फ्लैट-स्क्रीन पर उसी के चैनल का एंकर चीख रहा है—
“बुंदेलखंड के कबलोई गाँव में पिछले छह महीनों में तीसरी वारदात!
तीसरी बच्ची गायब!
क्या प्रशासन सोया हुआ है?”
पास बैठी एक और रिपोर्टर दीपा आँखें घुमाती है।
“यार, ये रमेश कैमरा ऑन होते ही चीखने क्यों लगता है?”
वर्षा धुआँ छोड़ते हुए मुस्कुराती है।
“नाटक कंपनी में काम करता था, इसलिए वो एंकर है। और हम रिपोर्टर।”
तभी वर्षा की नज़र स्क्रीन के एक कोने पर अटक जाती है।
कैमरा एक हलवाई की दुकान पर रुकता है।
स्थानीय रिपोर्टर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा है।
डरे बैठे हलवाई की तरफ़ माइक बढ़ाता है।
वर्षा की नज़र पीछे रखी मिठाइयों पर जाती है।
लड्डू।
बर्फ़ी।
और उनके सामने — दो मासूम लड़कियाँ मज़े से मिठाई खा रही हैं।
वर्षा के लिए आवाज़ें अचानक बंद हो जाती हैं।
—
फ़्लैशबैक — कई साल पहले
एक आदमी का चेहरा।
“नरेंद्र अंकल!”
नन्ही वर्षा, हाथ में गुड़िया लिए, उससे लिपट जाती है।
नरेंद्र हाथ फैलाता है।
उसमें सुनहरे पैकेट में चॉकलेट्स।
वर्षा मुट्ठी भर उठाती है।
“चलो बेटा,” नरेंद्र कहता है।
“अंदर टीवी देखेंगे। चॉकलेट खाएँगे।”
“लेकिन मम्मी?”
“मम्मी ने स्लीपिंग पिल्स ली हैं,” वह मुस्कुराता है। “सो रही हैं।”
“ओके, अंकल।”
छोटी लड़की कमरे में जाती है।
पीछे-पीछे नरेंद्र की परछाईं।
दरवाज़ा बंद होता है।
—
वर्षा वर्तमान में लौट आती है।
शरीर में एक सिहरन दौड़ती है।
टीवी पर एंकर अब भी चीख रहा है।
दीपा उसकी तरफ़ देखती है।
“क्या हुआ, वर्षा? कहाँ खो गई थी?”
वर्षा कुछ नहीं कहती।
वह सिगरेट बुझाती है।
पर्स और एक फ़ाइल उठाती है।
दरवाज़े तक पहुँचकर रुकती है।
बिना पीछे देखे कहती है—
“मुझे ये केस इन्वेस्टीगेट करना है। किसी भी क़ीमत पर।
अगर ये केस बड़ा निकला… तो सिर्फ़ टीआरपी नहीं बदलेगी।
मेरी हैसियत बदलेगी।”
और बाहर निकल जाती है।
— जारी —