Trikon - 5 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 5 — इंस्पेक्टर अनीश

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Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 5 — इंस्पेक्टर अनीश

जोगी नीचे चला गया था बाइक निकालने।

वर्षा ने जल्दी-जल्दी सामान समेटा।

एक बार कमरे को देखा।

बिस्तर।

कुर्सी पर सूखे कपड़े।

ठंडी इस्त्री।

फिर बिना रुके बाहर निकल गई।

नीचे बरामदे में जोगी बाइक के पास झुका था।

एक छोटे पंप से टायर में हवा भर रहा था।

वह उठ खड़ा हुआ।

“किसी ने टायर की हवा निकाल दी।”

उसने जेब से मुचड़ा हुआ कागज़ निकाला।

“ये एक्सहॉस्ट में फँसा था।”

वर्षा ने कागज़ खोला।

अख़बार की कटिंग्स से काटे गए अक्षर।

बेमेल।

साफ़।

सुनियोजित।

“जिन रास्तों पे चल रहे हो वहाँ सिर्फ़ मौत मिलेगी।

लौट जाओ।”

वर्षा ने ऊपर देखा।

जोगी की आँखें शांत थीं।

गुस्से से ज़्यादा सतर्क।

“अब भी इंस्पेक्टर अनीश को खोजना चाहती हैं?”

वर्षा की आवाज़ ठंडी थी। “अब तो और भी ज़्यादा।”

उसी दोपहर।

कबलोई के बाज़ार के पीछे की गली।

जोगी गाँव के भेदियों से अच्छी तरह वाकिफ़ था।

वर्षा थोड़ी दूरी पर खड़ी रही।

एक दुबला-पतला आदमी—

ड्रग-एडिक्ट-सा दिखता हुआ।

आँखें लाल।

हाथ काँपते हुए।

जोगी ने उसके हाथ में नोटों की एक छोटी गड्डी थमाई।

दोनों के बीच फुसफुसाहट हुई।

आदमी ने इधर-उधर देखा।

फिर पहाड़ी की दिशा में इशारा किया।

कुछ कहा।

जोगी वापस आया।

बाइक पर बैठा।

“पता लगा?” वर्षा ने पूछा।

जोगी ने हाँ में सिर हिलाया।

“पर मैडम…

मेरे ख़्याल से मुझे ही मिलने जाने दीजिए।

आपको लॉज में छोड़ देता हूँ।”

“मैं भी जाऊँगी।”

स्वर में बहस की जगह नहीं थी।

जोगी ने कुछ सेकंड उसे देखा।

“ठीक है।”

बाइक स्टार्ट हुई।

दो घंटे बाद।

कबलोई से दूर एक सुनसान पहाड़ी रास्ता।

सड़क पतली।

इधर-उधर बिखरी चट्टानें।

दूर एक पत्थर का पक्का मकान दिखा।

चिमनी से हल्का धुआँ उठ रहा था।

घर के चारों तरफ़ फेंस खिंचा था।

लकड़ी के मोटे तख़्ते।

उनमें फँसी कंटीली तारें।

एक ओर छोटा-सा जनरेटर रखा था।

लकड़ी का फाटक —

हल्का-सा खुला।

दोनों बाइक से उतरे।

हवा में अजीब-सी चुप्पी थी।

जोगी ने फाटक को हल्का धक्का दिया।

तुरंत अंदर कहीं सायरन बज उठा।

तीखी आवाज़।

अंदर का दरवाज़ा खुला।

एक बड़ा जर्मन शैफर्ड पूरी रफ़्तार से उनकी तरफ़ भागा।

वर्षा का खून सूख गया।

पर जोगी अडिग खड़ा रहा।

कुत्ता पास आकर गुर्राने लगा, कुछ सेकंड रुक-रुक कर भौंकता रहा—

दाँत दिखाते हुए।

जोगी ने धीरे-धीरे अपना हाथ आगे बढ़ाया।

न कोई झटका।

न कोई डर।

धीरे से पुकारा— “शांत…”

कुछ और सेकंड।

कुत्ते की भौंक धीमी हुई।

वह पास आकर बैठ गया।

दम हिलाने लगा।

जोगी उसके सिर पर हाथ फेर रहा था।

सायरन बंद हो चुका था।

तभी घर के भीतर से एक आदमी निकला।

सेमि-ऑटोमैटिक राइफल हाथ में।

तंदरुस्त शरीर।

चेहरे पर सख़्ती।

काले-सफेद बाल।

घनी दाढ़ी-मूँछें।

बंदूक सीधे उनकी तरफ़ तनी हुई।

“कौन हो?”

वर्षा हल्का आगे बढ़ी।

कार्ड निकाला।

“जी… मैं KGN न्यूज़ की रिपोर्टर हूँ। वर्षा मलिक।”

आदमी की आँखें सिकुड़ीं।

“रिपोर्टर?”

हल्की हँसी।

“तो पहले तुझे ही ठोकूँगा।”

वर्षा ने थूक गटका।

राइफल की नली जोगी की तरफ़ घूमी।

“और तू? पहलवान लगता है… आर्मी या पुलिस?”

जोगी सीधा खड़ा हो गया।

“उनतीसवीं बटालियन। दो साल।

कारगिल सेक्टर—इंजीनियरिंग टीम।

फिर दो साल अर्धसैनिक बल के ऑफिस में।”

वर्षा ने पहली बार उसे इस तरह बोलते सुना।

आदमी की पकड़ ढीली हुई।

राइफल नीचे आई।

जोगी ने पूछा, “आप… इंस्पेक्टर अनीश?”

“इंस्पेक्टर नहीं रहा अब।

सिर्फ़ अनीश।”

एक पल दोनों को परखा।

“अंदर आओ।”

फिर जोगी की तरफ़ देखते हुए कहा—

“तू आर्मी वाला है।

इस रिपोर्टर लड़की से बचके रहना।

ये लोग किसी के सगे नहीं होते।”

अंदर जाते हुए वर्षा बुदबुदाई—

“जोगी… तेरे बिना मेरा क्या होता?”

जोगी ने हल्की मुस्कान से चुप रहने का इशारा किया।

घर के अंदर।

पत्थर की दीवारें।

लकड़ी का फर्श।

कम रोशनी।

जनरेटर की धीमी घरघराहट।

अनीश कुछ देर बैठा उन्हें देखता रहा।

“बोलोगे? क्यों आये हो यहाँ?”

जोगी बोला—

“सर… जो लड़कियाँ गायब हो रही हैं…”

अनीश के चेहरे पर एक झटका-सा आया। फिर ठंडा भाव।

“तो?”

वर्षा ने सीधा पूछा—

“आपने कई केस देखे हैं। कोई पैटर्न? कोई सुराग?”

अनीश की आँखें चमकीं।

“सुराग मिला होता न लड़की…

तो किसी के सिर में सुराख कर चुका होता मैं।”

कमरा जैसे थर्रा गया।

कुछ सेकंड सन्नाटा।

फिर वह उठा।

“रुको। कुछ दिखाता हूँ।”

अंदर के कमरे से दराज़ खुलने-बंद होने की आवाज़।

अनीश एक सीडी लेकर लौटा।

पुराना प्लेयर चालू किया।

स्क्रीन पर धुँधली रिकॉर्डिंग।

जंगल।

आग।

अधनंगे आदमी।

जानवरों के मुखौटे।

फिर—

छोटी लड़कियाँ।

आँखों पर पट्टी।

एक-दूसरे के कंधे पकड़े।

वर्षा की साँस अटक गई।

“I can’t…”

जोगी ने भी नज़र फेर ली।

अनीश ने वीडियो पॉज़ किया।

“नहीं देख सकते?

मैंने पूरा देखा है ये। कई बार।

सोचा शायद किसी का चेहरा साफ़ दिख जाए।

नहीं दिखा।”

वह सोफे पर ढह गया।

सालों की तफ़्तीश और दबे हुए गुस्से ने मानों उसे अंदर से ख़ाक कर दिया था।

“सरोज… चितरंजन की बेटी…

मेरा पहला किडनैपिंग केस थी।

खून बहुत गर्म था तब।

लगता था सब कुछ कर सकता हूँ।”

एक लंबा विराम।

“जब उसकी फ्रॉक नदी किनारे मिली…

समझ गया— मैं हार गया था।

और वो लोग जीत गए।”

सन्नाटा।

“कौन जीत गए?” वर्षा ने धीमे पूछा।

“बहुत बड़े लोग।

तुमसे, मुझसे, कानून से ऊपर।”

उसकी आवाज़ में कड़वाहट थी।

“तीन साल भागा इधर-उधर।

कुछ गिरफ़्तारियाँ कीं।

ऐसे कुछ वीडियो मिले।

कागज़ात मिले।

पर कुछ पुख्ता नहीं।”

“फिर?” जोगी ने पूछा।

अनीश सूखी हँसी हँसा।

“फिर ऊपर से आदेश आया—

क्या बेकार के केस में पड़े हो?

गाँव में पॉकेटमारी बढ़ रही है, वो संभालो।”

रुका।

“मैं नहीं माना।

लगा रहा।

तो ऑस्ट्रेलिया में मेरी बहन के घर

पत्थर फेंका गया।

उसमें लिपटी चिट्ठी।

अख़बार की कटिंग्स से बना मेरा नाम।”

कमरे की हवा भारी हो गई।

“तब मैं पीछे हट गया।”

“आपने ये वीडियो किसी को दिखाया नहीं?” वर्षा ने पूछा।

“क्या दिखाता? ऐसे हज़ारों वीडियो इंटरनेट पर पड़े हैं,” अनीश बोला।

“सबूत नहीं हैं ये। बस शोर हैं।”

जोगी ने पूछा— “अनीश जी। हाल के केसों में मिठाई के दोने मिलते थे। आपको भी—?”

अनीश गंभीर हो गया।

“दोने तो नहीं।

लाल धागे ज़रूर मिलते थे।”

“लाल धागे?” वर्षा ने नोटपैड में लिखा। “धार्मिक अनुष्ठान?”

“पता नहीं।” अनीश फिर उठा।

लोहे की पुरानी अलमारी खुली।

वापस लौटा— हाथ में काँच की पतली बोतल।

अंदर लाल-बैंगनी रंग का धागा।

बोतल जोगी के हाथ में थमा दी।

“सरकारी सबूत?” वर्षा ने पूछा।

अनीश भड़क उठा।

“सरकार की अलमारियों में ऐसे बहुत सबूत दफ़न हैं।

पर कोई पकड़ा नहीं गया आज तक।”

धीमे स्वर में जोड़ा— “ये धागा… मुझे मेरी नाकामी याद दिलाता है।”

जोगी ने बोतल का ढक्कन खोला।

धागा बाहर निकाला।

हल्का-सा खींचा।

“जोगी?” वर्षा ने पूछा, “कबलोई में लोग धर्म-कर्म में ऐसे धागे इस्तेमाल करते हैं?”

“न।”

जोगी ने धागा उँगलियों के बीच रगड़ा।

“पहली बात तो ये सूती नहीं है।

नायलॉन या सिंथेटिक लगता है।

धर्म में तो सूती धागे, कपड़े चलते हैं।

कलावा भी मोटा होता है।

ये तो बाल जैसा पतला है।”

वर्षा के चेहरे पर अचानक एक चमक आई।

नोटपैड तेज़ी से पलटने लगी।

“क्या हुआ?” जोगी ने पूछा।

अनीश भी सीधा बैठ गया।

वर्षा ने एक पन्ना निकाला।

“सरोज ही इकलौती लड़की थी जो ज़िंदा मिली थी।”

“तो?” अनीश ने कहा।

“उसने कहा था —

उसे भूत ले गया था।

बड़ी आँखें।

पीले दाँत।

और लाल बाल।”

कमरे में कुछ सेकंड सन्नाटा।

जोगी बोला—

“उसे अंदरूनी चोटें थीं।

डॉक्टरों ने मॉर्फिन दी थी।

होश में नहीं थी।”

वर्षा खड़ी हो गई।

कमरे में टहलने लगी।

“बड़ी आँखें — हो सकती हैं।

पीले दाँत — आम बात है।

पर लाल बाल…”

रुककर दोनों की तरफ़ देखती है।

“ये बहुत स्पेसिफिक डिटेल है।

नहीं?”

जोगी ने हाथ में पकड़े धागे को देखा।

“लाल… बाल…”

अनीश झुंझलाया।

“ये तुम लोग क्या थ्योरी बना रहे हो?”

वर्षा का स्वर सख़्त हो गया।

“आपके पास कंप्यूटर है?”

अनीश ने जोगी को देखा।

जैसे पूछ रहा हो — किसे ले आये यहाँ?

जोगी ने कंधे उचकाए।

“प्लीज़ सर, मुझे आप लोगों को कुछ दिखाना है।” वर्षा ने विनती की।

अनीश बड़बड़ाता हुआ उठा।

“इस रिपोर्टर को तो एक दिन ठोकूँगा ही…

तुझे भी साथ में ठोकूँगा, फौजी।”

सोफ़े की गद्दियाँ पलटीं।

नीचे से एक पुराना लैपटॉप निकला।

पावर ऑन किया।

टेबल पर रख दिया।

वर्षा तेज़ी से बैठ गई।

टाइप करने लगी।

जोगी और अनीश उसके पीछे खड़े।

स्क्रीन पर वही सात साल पुराना वीडियो खुला।

रैंप।

लाइट्स।

मॉडल्स नकली विग पहने चल रही हैं।

वर्षा वीडियो को आगे बढ़ाती है।

आख़िरी पाँच मिनट।

स्टेज पर एंकर की आवाज़—

“और अब स्वागत कीजिए

इस फैशन शो के स्पॉंसर,

देसी हेयर कंपनी के मालिक,

श्री रजनीश ‘राज’ लढवान का!”

तालियाँ।

राज लढवान मंच पर आता है।

हाथ हिलाता है।

स्पॉटलाइट उसके सिर पर पड़ती है।

घने —

चटक —

लाल रंग के बाल।

एक विग।

कमरे में सन्नाटा।

जोगी की उँगलियाँ कस गईं।

अनीश आगे झुक आया।

वर्षा स्क्रीन को घूर रही थी।

वीडियो रुका हुआ था।

तीनों की आँखें एक ही चीज़ पर जमी थीं।

लाल बाल।

और उस लाल बाल के ठीक पीछे

देसी हेयर का लोगो।


— जारी —