गोदाम।
अँधेरे कमरे में बड़ी स्क्रीन चमक रही थी।
सामने अनीश चुप खड़ा देख रहा था।
टीवी चैनलों की फुटेज एक के बाद एक चल रही थीं।
एंकर चीख रहा था—
“भिवंडी की दर्दनाक घटना!
पच्चीस मासूमों को निगल गई नदी!”
नीचे टिकर भाग रहा था—
“शराबी ड्राइवर बना मौत का सौदागर।”
“स्कूल बस हादसे में सभी बच्चियों के मारे जाने की आशंका।”
अनीश कुर्सी पर झुका बैठा था।
उसने सिर खुजलाया।
“पर ज़ेरोइन… इसका हमारे क्लू से क्या लेना-देना?”
स्क्रीन के दूसरे कोने में एन्क्रिप्टेड विंडो खुली थी।
डिजिटल मास्क।
ज़ेरोइन की बदली हुई आवाज़।
“एल्गोरिथ्म पैटर्न सर्च का टॉप नतीज़ा यही था।”
स्क्रीन पर एक नई तस्वीर उभरी।
मुस्कुराती हुई नवीना जांगिड़।
उसके चारों तरफ अनाथालय की बच्चियाँ।
मीडिया फोटो।
अनीश ने आँखें सिकोड़कर देखा।
धीरे से बुदबुदाया—
“सफ़ेद साड़ी…”
एक पल सोचा।
“तो ये है हमारी डायन?”
ज़ेरोइन कुछ सेकंड चुप रही।
फिर बोली—
“कहना मुश्किल है।
शायद कोई कनेक्शन न हो।
एल्गोरिथ्म ने कुछ और नतीजे भी निकाले हैं।
मैं और छानबीन करूँगी।”
उसी समय—
दीवार पर लगी छोटी मॉनिटर स्क्रीन पर
एक लाल निशान चमका।
दूर कहीं हल्का अलार्म बजने लगा।
अनीश एक झटके से उठ खड़ा हुआ।
कीबोर्ड पर तेज़ी से उंगलियाँ चलने लगीं।
दूसरी स्क्रीन पर फीड खुली।
परिमीटर कैमरा।
अँधेरे में कई परछाइयाँ।
हाथों में AR राइफलें।
चेहरों पर स्की मास्क।
अनीश की आँखें फैल गईं।
वह जोर से चिल्लाया—
“जोगी! जोगी!”
अंदर वाले कमरे का दरवाज़ा खुला।
जोगी दौड़ता हुआ बाहर आया।
“क्या हुआ अनीश भाई?”
अनीश स्क्रीन की तरफ इशारा करते हुए बोला—
“Mayday!”
कुछ सेकंड के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।
फिर ज़ेरोइन की आवाज़ स्पीकर से आई—
“अनीश… निकलो वहां से।”
अलार्म अब तेज़ हो चुका था।
—
बंदूकधारी ने गोदाम के दरवाज़े पर चार्ज फिट किया।
“Stand Back.”
तेज़ धमाका हुआ।
दरवाज़ा तहस-नहस।
धुएँ को चीरते कई बंदूकधारी तेज़ी से अंदर घुस आए।
चेहरों पर स्की मास्क।
हाथों में AR राइफलें।
वे बिजली की तरह पूरे गोदाम में फैल गए।
“क्लियर!”
“इधर देखो!”
“कंप्यूटर उठा लो!”
एक-एक कर सब चीज़ें खंगालने लगे।
लैपटॉप।
हार्ड ड्राइव।
फाइलों के ढेर।
मशीनें।
सब ज़ब्त करने लगे।
गोदाम के बीचों-बीच चार बड़े प्रोपेन गैस सिलेंडर पड़े थे।
एक बंदूकधारी आगे बढ़ा।
उसने सिलेंडर पर हाथ रखा।
वाल्व घुमाकर देखा।
“नो लीक।”
दूसरा भी आगे आया।
एक-एक कर चारों सिलेंडर चेक किए गए।
सब ठीक।
उसी समय एक बंदूकधारी का पैर फर्श के एक हिस्से पर पड़ा।
चर्र…
हल्की आवाज़।
वह ठिठक गया।
नीचे झुककर देखने ही वाला था—
कि जैसे ही उसने पैर उठाया—
धड़ाम!
नीचे छिपी लैंडमाइन फट गई।
एक पल के भीतर सिलेंडरों ने भी आग पकड़ ली।
और अगले ही सेकंड— भीषण विस्फोट।
पूरे गोदाम के अंदर आग का गोला फैल गया।
गैस के सिलेंडर फट पड़े।
अंदर खड़े सारे कमांडो उसी पल अस्थि-पिंजर बनकर राख हो गए।
दीवारें फट गईं।
आग और गैस के गुब्बारे बाहर की तरफ उछले।
गोदाम एक जलते हुए दानव की तरह धधकने लगा।
करीब आधा किलोमीटर दूर।
घनी झाड़ियों के बीच।
जमीन का एक लोहे का ढक्कन धीरे-धीरे ऊपर उठा।
नीचे से पहले अनीश निकला।
फिर जोगी।
दोनों ने पीछे मुड़कर देखा।
दूर गोदाम की जलती हुई आकृति आसमान में आग उगल रही थी।
घना काला धुंआ आसमान में घुल रहा था।
जोगी हल्के विस्मय से बोला—
“सर… कमाल का काम करते हैं आप।
दुश्मन भी खत्म… और कोई कागज़ात भी उनके हाथ नहीं लगे।”
अनीश हल्का हँसा।
“अरे… ऐसे मेरे बहुत से खुफिया अड्डे हैं।”
उसने दूर जलते गोदाम की तरफ देखा।
“पूरी ज़िंदगी ऐसे ही युद्ध की तैयारी में बिताई है।”
फिर वह पास की झाड़ियों में झुका।
घास के नीचे छिपी एक पुरानी स्कूटी बाहर खींची।
जोगी ने अचानक पूछा— “मालती को भी तो खतरा होगा?”
अनीश ने सिर हिलाया।
“इस खतरे को मैंने पहले ही भाँप लिया था।
उस दिन पार्टी के बाद ही उसे ट्रेन में बैठा दिया था।
अब तक तो हमारे गाँव पहुँच गई होगी।”
उसने स्कूटी स्टार्ट की।
“ये सब खत्म हो जाए… तब वापस बुलाऊँगा।”
इंजन की हल्की घरघर।
दोनों स्कूटी पर बैठ गए।
और अँधेरे रास्ते की तरफ निकल पड़े।
पीछे आसमान में आग अभी भी भड़क रही थी।
—
कच्ची सड़क पर धूल उड़ाता ट्रक आखिरकार छेदीपुरा के बीचों-बीच आकर रुका।
सामने एक पुरानी सराय थी।
दरवाज़े पर चार लठैत खड़े थे।
दो के कंधों पर बंदूकें।
तिरपाल उठा।
डरी-सहमी लड़कियाँ एक-एक कर नीचे उतरीं।
चुपचाप।
जैसे आवाज़ भी निकलने से डरती हों।
उन्हें अंदर ले जाया गया।
—
सराय के भीतर।
एक औरत खड़ी थी।
पुष्पा देवी।
गहरी जामुनी साड़ी, सिर पर पल्लू, चेहरे पर चौड़ी मुस्कान।
उसने हाथ फैलाकर कहा—
“आओ बच्चियों… डरो मत।
यहाँ आराम से रहो।
तुम्हारे रहने, खाने, कपड़ों… सबकी व्यवस्था है।”
लड़कियाँ चारों ओर देखने लगीं।
ऊँची दीवारें।
लोहे के दरवाज़े।
खिड़कियों में मोटी सलाखें।
यह उनका नया घर नहीं था।
नई जेल थी।
—
बाहर।
प्रभु ने आगे बढ़कर हाथ जोड़े।
“प्रणाम, दयाल बाबू।”
गाँव के सरपंच दयाल बाबू खड़े थे।
मोटा पेट, सफ़ेद कुर्ता।
प्रभु ने एक काला डफ़ल बैग उनके हाथ में थमा दिया।
दयाल बाबू ने ज़िप खोली।
अंदर नोटों के बंडल।
उन्होंने तुरंत ज़िप बंद कर दी।
प्रभु बोला— “अरे गिन तो लीजिए।”
दयाल बाबू हँसे।
“अरे मालिक… क्यों शर्मिंदा करते हैं?”
प्रभु ने धीरे से पूछा— “मेरी पारो का क्या हाल है?”
दयाल बाबू ने मुस्कुराकर कहा—
“वैसी ही है मालिक।
उसकी उम्र तो जैसे तीस से आगे बढ़ती ही नहीं।”
प्रभु धीरे-धीरे चलते हुए थोड़ी दूर एक छोटे घर तक पहुँचा।
दरवाज़ा खटखटाया।
अंदर से एक दुबला-पतला लड़का निकला।
चिंटू।
लगभग पंद्रह साल का।
“अरे… प्रभु अंकल।”
प्रभु ने उसके गाल पर हाथ फेरा।
कोट की जेब से चॉकलेट निकालकर दी।
“कैसा है बेटा, चिंटू?”
चिंटू थोड़ा सहम गया।
“थ… ठीक हूँ अंकल।”
प्रभु अंदर आकर सोफे पर बैठ गया।
“और बेटे मम्मी कहाँ है?”
तभी अंदर बाथरूम से आवाज़ आई— “अरे प्रभु साहब!”
दरवाज़ा खुला।
तौलिया सीने पर कसकर लपेटे एक औरत बाहर आई।
भीगे बालों से पानी टपक रहा था।
पारो।
करीब पैंतीस साल की।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“बहुत दिन बाद आए प्रभु साहब।”
आकर प्रभु के पास बैठ गई।
चिंटू ने तुरंत नज़र फेर ली।
प्रभु ने पारो का गाल थपथपाया।
पारो ने लड़के की तरफ देखा—
“अरे चिंटू… जा बेटा, एक-दो घंटे बाहर खेल।”
चिंटू का गला भर आया।
वह कुछ कहना चाहता था।
पर कह नहीं पाया।
धीरे से बाहर निकल गया।
दरवाज़ा पीछे से बंद हुआ।
चिटखनी लगने की आवाज़।
चिंटू कुछ पल दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा।
फिर अपने हाथ में पकड़ी चॉकलेट को देखा।
और पास पड़े कूड़ादान में फेंक दी।
वह बिना पीछे देखे आगे बढ़ गया।
—
कुछ मिनट बाद।
पारो और प्रभु एक चादर में लिपटे पड़े थे।
दोनों की साँसें अभी भी हल्की तेज़ थीं।
प्रभु ने धीरे से पारो को एक ओर किया और बिस्तर से उठ बैठा।
अचानक उसकी साँस थोड़ी तेज़ हो गई।
जैसे दिल की धड़कन एक पल को उछल पड़ी हो।
उसने पास पड़े अपने कोट की जेब से एक छोटी शीशी निकाली।
दो सफ़ेद गोलियाँ मुँह में डालकर पानी के बिना ही निगल लीं।
फिर हल्का सा हाथ अपनी छाती पर रखा।
गहरी साँस ली।
और बुदबुदाया—
“शांत…”
दूर कहीं।
एक अँधेरे कमरे में।
कंप्यूटर स्क्रीन पर डेटा की धाराएँ बह रही थीं।
अचानक एक छोटा सा पिंग उभरा।
ज़ेरोइन की नज़र तुरंत स्क्रीन पर टिक गई।
एक मेडिकल टेलीमेट्री सिग्नल।
लोकेशन मैप पर एक बिंदु चमका।
छेदीपुरा गाँव।
ज़ेरोइन तुरंत कीबोर्ड पर झुक गई।
वेब सर्च खुला।
स्क्रीन पर नतीजे उभरे—
“छेदीपुरा गाँव खाली कराया गया।”
“केमिकल लीक से दो लोगों की मौत।”
पांच साल पहले की टाइमस्टैम्प।
ज़ेरोइन ने भौंहें सिकोड़ लीं।
धीरे से बुदबुदाई—
“खाली गाँव… और पेसमेकर का सिग्नल?”
उसकी उंगलियाँ अब और तेज़ी से कीबोर्ड पर दौड़ने लगीं।
— जारी —