Trikon - 3 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 3 - छिपे हुए खतरे

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Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 3 - छिपे हुए खतरे

जीप गाँव से बाहर निकल चुकी थी।

धूल पीछे उड़ रही थी।

सड़क धीरे-धीरे कच्चे रास्ते में बदल रही थी।

वर्षा पीछे की सीट पर बैठी थी।

दोनों तरफ़ दो आदमी।

सामने ड्राइवर और एक और।

वर्षा ने धीरे से मोबाइल निकाला।

नेटवर्क के दो टिमटिमाते बार।

फिर गायब।

उसने कॉल लगाने की कोशिश की।

कट।

फिर संदेश टाइप किया—

Location unknown. Being taken—

सेंड नहीं हुआ।

स्क्रीन पर उभरा — No service.

उसका गला सूख रहा था।

वह खिड़की से बाहर देखने लगी।

सूखी झाड़ियाँ।

दूर खेत।

कोई बस्ती नहीं।

जीप और अंदर जा रही थी।

उसी समय दूसरी तरफ़ से एक मोटरसाइकिल आती दिखी।

धूल के बीच।

जोगी।

वह सामान्य रफ़्तार से जा रहा था।

फिर उसकी नज़र जीप पर पड़ी।

एक पल।

उसने वर्षा को देखा।

वर्षा ने भी उसे देखा।

उसकी आँखों में जो था — वह शब्द नहीं था।

जोगी ने तुरंत बाइक मोड़ दी।

इंजन की आवाज़ तेज़ हुई।

वह जीप के पीछे आ लगा।

जीप की रफ़्तार बढ़ी।

जोगी ने बाइक और तेज़ कर दी।

कुछ सेकंड बाद उसने बाइक जीप के आगे घुसा दी।

अचानक ब्रेक।

जीप धूल उड़ाती हुई रुक गई।

जोगी बाइक से उतरा।

धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

जीप के ठीक सामने आकर खड़ा हो गया।

“लड़की को लेकर कहाँ जा रहे हो?”

जीप का दरवाज़ा खुला।

एक आदमी उतरा।

“बाइक हटा, बे।”

जोगी हिला नहीं।

आदमी त्योरियाँ चढ़ाकर आगे बढ़ा।

मुट्ठी उठाई।

जोगी ने उसका हाथ बीच में पकड़ लिया।

एक झटके में उसकी गर्दन दबोच ली।

दूसरे ही पल — उसे ज़मीन से उठाकर जीप के बोनट पर पटक दिया।

धड़ाम।

बोनट धँस गया।

गुंडे की साँस अटक गई।

जीप के अंदर बैठे बाकी लोगों के चेहरों की हवाइयाँ उड़ गईं।

एक ने कमर की तरफ़ हाथ ले जाना चाहा —

पर जोगी की आँखें उस पर टिक गईं।

स्थिर।

चेतावनी भरी।

वर्षा तुरंत दरवाज़ा खोलकर उतरी।

तेज़ कदमों से भागकर जोगी के पीछे आ खड़ी हुई।

साँस तेज़।

हाथ काँपते हुए।

बोनट पर पड़ा गुंडा कराहता हुआ फिसलकर नीचे गिरा।

लड़खड़ाता हुआ जीप में जा बैठा।

ड्राइवर ने गियर बदला।

जीप धीरे-धीरे पीछे होने लगी।

खिड़की से वही आदमी सिर बाहर निकालकर बोला—

“देख लेंगे बे तुझे।”

जीप घूमी।

धूल का गुबार उठा।

कुछ ही सेकंड में वह दूर चली गई।

सन्नाटा।

थोड़ी देर बाद जोगी की मोटरसाइकिल वर्षा की लॉज की तरफ़ बढ़ रही थी।

वर्षा पीछे चुप बैठी थी।

हवा उसके बालों से टकरा रही थी।

जोगी ने आवाज़ ऊँची की—

“सूबेदार के गुंडे थे ये।

यहाँ की सांसद अपराजिता लढवान का हाथ है उसके सर पर।”

एक क्षण का विराम।

“गाँव के बाहर बड़ी कोठी है उसकी।

कई गलत धंधे वहीं चलते हैं।”

वर्षा चुप रही।

लॉज के बाहर मोटरबाइक रुकी।

वर्षा उतरी।

“थैंक्यू,”

उसकी आवाज़ धीमी थी।

जोगी ने सिर हिलाया।

“मेरा नंबर नोट कर लीजिए।

जहाँ जाना होगा, ले जाऊँगा।”

“जी… पर आपका समय—”

“कोई बात नहीं,”

जोगी ने बीच में काट दिया।

“बहुत लोगों को खो चुका है ये गाँव।

अब गाँव की मेहमान को मैं खोने नहीं दूँगा।”

वह नंबर बताता है।

इंजन स्टार्ट करता है।

बिना पीछे देखे चला जाता है।

वर्षा वहीं खड़ी रहती है।

हल्की-सी मुस्कान।

और भीतर कहीं —

एक छोटी-सी राहत।

देर रात जोगी अपने घर पहुँचता है।

मिट्टी की दीवारें।

छत पर टँगी एक बल्ब की हल्की पीली रोशनी।

वह दरवाज़ा अंदर से बंद करता है।

कुछ क्षण खड़ा रहता है।

फिर धीरे-धीरे कमरे के कोने में रखी पुरानी अलमारी की तरफ़ बढ़ता है।

अलमारी खोलता है।

अंदर कपड़ों के नीचे एक लकड़ी का छोटा दराज़।

वह उसे खींचता है।

अंदर कपड़े में लिपटी हुई एक हैंडगन पड़ी है।

जोगी उसे बाहर निकालता है।

धूल फूँककर हटाता है।

एक दराज़ से मैगज़ीन निकालता है।

गोलियाँ पहले से भरी हुई हैं।

मैगज़ीन को बंदूक में फिक्स करता है।

एक ठंडी, साफ़ आवाज़।

टक।

फिर स्लाइड पीछे खींचता है।

चक।

कमरे में आवाज़ थोड़ी गूँजती है।

वह बंदूक हाथ में लेकर सामने लगे छोटे से शीशे के सामने आ खड़ा होता है।

कुछ पल खुद को देखता है।

फिर धीरे से बंदूक उठाता है।

नली सीधे शीशे की तरफ़।

आँखें स्थिर।

साँस नियंत्रित।

एक पुराने, सधे हुए शूटर की तरह पकड़।

कुछ सेकंड।

फिर वह बंदूक नीचे कर देता है।

शीशे में उसका चेहरा अब अलग दिखता है।

जैसे उसने कोई फैसला कर लिया हो।

वह बंदूक को खोलकर फिर से कपड़े में नहीं लपेटता।

इस बार उसे अलमारी के ऊपर रख देता है।

बल्ब की रोशनी में धातु हल्की चमकती है।

उधर लॉज का कमरा।

पंखा धीमी आवाज़ में घूम रहा है।

दीवारों पर सीलन की गंध।

टेबल पर आधा भरा पानी का गिलास।

रात गहरी है पर वर्षा लैपटॉप खोले बैठी है।

इंटरनेट की स्पीड कछुए जैसी।

स्क्रीन पर नाम उभरता है — अपराजिता लढवान।

चौड़ा चेहरा।

बड़ी मुस्कान।

हाथ जोड़े।

गले में माला।

रैलियों के वीडियो।

भीड़ “जय-जय” कर रही है।

मंच पर फूल बरस रहे हैं।

एक तस्वीर — गाँव के स्कूल का उद्घाटन।

दूसरी — एनजीओ के बच्चों को कंबल बाँटते हुए।

तीसरी — किसी मंदिर के सामने विशाल मूर्ति का अनावरण।

साड़ी।

सलवार सूट।

हर फ्रेम में एक नियंत्रित, संतुलित, “मातृत्वपूर्ण” उपस्थिति।

वर्षा बिना भाव बदले स्क्रॉल करती रहती है।

नीचे परिवार का सेक्शन।

पति — धर्मेश लढवान।

लकवे के रोगी।

एक पुरानी तस्वीर — व्हीलचेयर पर बैठे अपराजिता उनके कंधे पर हाथ रखे हुए।

वर्षा की आँखें एक सेकंड ज़्यादा ठहरती हैं।

फिर अगला नाम।

राजनीश लढवान। उर्फ़ राज।

बहुत कम खबरें।

“University of California से Sociology स्नातक।”

“मुंबई स्थित ‘Desi Hair’ नामक विग कंपनी का मालिक।”

वर्षा वीडियो लिंक पर क्लिक करती है।

एक सात साल पुराना प्रमोशनल वीडियो खुलता है।

रैंप।

लाइट्स।

मॉडल्स नकली विग पहनकर चल रही हैं।

धीमी अंग्रेज़ी संगीत।

वीडियो लंबा है।

वर्षा कुछ सेकंड देखती है।

फिर बंद कर देती है।

स्क्रीन पर फिर से अपराजिता की मुस्कान।

वह लैपटॉप बंद नहीं करती।

नोटपैड खोलती है।

कुछ नाम लिखे हुए हैं— जानकीदास।

पार्वती देवी।

सूबेदार।

नीचे नया नाम— जोगिंदर सांगवान।

वह हल्का मुस्कुराती है।

फिर अचानक जीप का दृश्य याद आता है।

धूल।

हैंडगन की झलक।

“देख लेंगे।”

उसके हाथ अनायास रुक जाते हैं।

वह कमरे में नज़र दौड़ाती है।

दरवाज़ा बंद है।

खिड़की के बाहर अँधेरा।

धीरे से बुदबुदाती है— “जल्द तफ़्तीश करके यहाँ से निकलना होगा। ये गाँव सेफ नहीं है।”

लैपटॉप की स्क्रीन पर अपराजिता लढवान अब भी मुस्कुरा रही है।


— जारी —

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