Trikon - 2 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 2 - सवाल-जवाब

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Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 2 - सवाल-जवाब

कबलोई जाने वाली बस खटारा थी।

सीटों का फोम बाहर निकला हुआ।

खिड़कियाँ आधी बंद, आधी जाम।

हर गड्ढे पर बस ऐसे उछलती जैसे विरोध कर रही हो।

वर्षा मलिक खिड़की के पास बैठी थी।

उसकी गोद में एक फ़ाइल खुली थी।

पीले पड़ चुके अख़बार की कतरनें।

“तीसरी बच्ची लापता।”

“प्रशासन पर सवाल।”

ब्लॉग पोस्ट के प्रिंटआउट —

गाँव में तांत्रिक सक्रिय?

बच्ची खुद भागी?

राजनीतिक साज़िश?

वह पन्ने पलटती जाती है।

हर केस में एक समानता।

उम्र।

समय।

और फिर — अचानक चुप्पी।

फोन वाइब्रेट करता है।

स्क्रीन पर नाम चमकता है — मिश्रा सर।

वह कॉल काट देती है।

दो सेकंड बाद फिर वाइब्रेशन।

इस बार उठाती है।

“हाँ सर।”

दूसरी तरफ़ खारी, कसी हुई आवाज़।

“वर्षा, कहाँ हो तुम?”

“बस में हूँ। कबलोई गाँव जा रही हूँ।”

“क्यों, वर्षा? यहाँ इतना काम पड़ा है।”

“कुछ तो है वहाँ, सर।”

“कुछ नहीं मिलेगा। समय बर्बाद कर रही हो।”

वर्षा खिड़की से बाहर सूखी ज़मीन देखती है।

“तो अगर कुछ मिला,”

वह शांत स्वर में पूछती है,

“आप एक्सक्लूसिव तो नहीं चाहेंगे न?”

दूसरी तरफ़ हल्की हँसी।

“जाओ, जो करना है करो। हमारा कोई सपोर्ट नहीं होगा।”

वर्षा भी हल्का मुस्कुराती है।

“ज़रूरत नहीं है, सर।

ये मेरा पर्सनल प्रोजेक्ट है।

मोबाइल से शूट कर लूँगी। कैमरा-मैन नहीं चाहिए।”

फोन कट।

वह चारों ओर देखती है।

तीन-चार मर्द उसे घूर रहे हैं।

नज़रें उसके चेहरे पर नहीं — नीचे।

“क्या है?”

वर्षा का स्वर तीखा।

वे तुरंत नज़रें फेर लेते हैं।

बस आगे बढ़ती रहती है।

 

रात उसने गाँव की एक छोटी-सी लॉज में गुज़ारी।

पंखा चरमराता रहा।

दीवारों पर सीलन की गंध।

नीचे से कभी-कभी कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आती रही।

सुबह वह नोटपैड लेकर निकलती है।

पहला घर — पारुल के माता-पिता।

आँगन में भीड़ है।

एक पुलिस का हवलदार चारपाई के पास बैठा है।

सामने पारुल के पिता जानकीदास, बगल में माँ पार्वती देवी।

हवलदार पूछ रहा है —

“और लड़की ने रात को खाया क्या था?”

जानकीदास हकला रहा है।

“जी… बाजरे की रोटी… अचार… उस दिन सुबह ही मैं बाजरा पिसवा के लाया था… तो फिर—”

“चुप बे। जितना पूछा जाए उतना बताओ,”

हवलदार झल्लाता है।

“पूरी कहानी मत सुनाओ।”

भीड़ में खड़ा जोगी वर्षा को देखता है।

एक साँस में बुदबुदाता है —

“लो आ गए ये पत्रकार, खून चूसने।”

वर्षा सुनती है।

अनसुना करती है।

हवलदार फिर पूछता है —

“लड़की को कोई बीमारी थी?

चक्कर आते थे?”

जानकीदास चुप।

तभी जोगी आगे बढ़ता है।

“ये क्या पूछ रहे हो आप?”

उसकी आवाज़ में दबा हुआ गुस्सा है।

“क्या खाया, क्या पिया…

ये सब छोड़िए।

बताइए अब तक क्या जाँच-पड़ताल की?”

हवलदार जोगी के क़द-काठी को देखकर क्षण भर ठिठकता है।

फिर वर्दी का रौब ओढ़ लेता है।

“सुनो बेटे,”

वह सख़्ती से कहता है,

“सरकारी काम में दखल दोगे तो अंदर कर दिए जाओगे।”

तभी वर्षा बोलती है।

स्वर ठंडा, मगर धारदार।

“सही कह रहे हैं ये,”

वह नोटपैड निकालते हुए कहती है।

“आप ये सब क्यों पूछ रहे हैं?

अपने थाना-प्रभारी का नाम और डेस्क नंबर बताइए।”

भीड़ में हलचल।

“हाँ बताओ!”

किसी ने कहा।

हवलदार हड़बड़ा जाता है।

रजिस्टर बंद करता है।

खड़ा हो जाता है।

“हमें क्या,”

वह बड़बड़ाता है।

“बच्ची नहीं मिलेगी तो हमें मत कहना।”

उसी पल वर्षा की नज़र खुले पन्ने के दाहिने कोने पर अटक गई।

नीली स्याही से बना एक छोटा-सा उल्टा त्रिकोण।

जैसे किसी नाम या पते के आगे जल्दी में लगाया गया निशान।

“एक मिनट,” वर्षा बोल पड़ी,

“ये क्या था?”

हवलदार ठिठका।

उसने रजिस्टर झटके से बंद किया।

फिर उसे बाँह के नीचे दबाकर तुनक गया।

“तुम्हें उससे क्या मतलब?”

उसने जोगी और वर्षा को घूरा

और तेज़ क़दमों से बाहर निकल गया।

भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी।

जोगी वर्षा की ओर मुड़ता है।

“साथ देने के लिए धन्यवाद,”

वह सपाट स्वर में कहता है,

“लेकिन अगर आप भूत-प्रेत की कहानी कवर करने आई हैं,

तो यहाँ ऐसा कुछ नहीं है।”

वर्षा हल्का मुस्कुराती है।

“ये किसी भूत का काम नहीं है।

या तो कोई सीरियल किलर है…

या बच्चों की तस्करी करने वाला गिरोह।”

जोगी पहली बार उसे ध्यान से देखता है।

उसकी आँखों में एक हल्की-सी बदलती हुई रेखा उभरती है।

वर्षा हाथ बढ़ाती है।

“वर्षा मलिक।

केजीएन न्यूज़ नेटवर्क।”

जोगी हाथ जोड़कर नमस्कार करता है।

“जोगिंदर सांगवान।

लोग जोगी कहते हैं।”

क्षण भर रुककर वह जोड़ता है —

“जो भी कीजिए,

इन माँ-बाप से ज़्यादा सवाल मत कीजिए।

यहाँ लोगों के अपने बहुत से सवाल अभी तक हल नहीं हुए हैं।”

वह मुड़कर चला जाता है।

वर्षा उसका नाम नोट करती है।

थोड़ी देर बाद, भीड़ छँट चुकी है।

आँगन में अब सिर्फ़ कुछ औरतें बची हैं।

वर्षा चारपाई के किनारे बैठी है।

हाथ में चाय का कप।

जानकीदास धीमी आवाज़ में बोलता है—

“बड़ी मिन्नतों के बाद हुई थी जी हमारी पारुल… पाँच साल डॉक्टरों के चक्कर काटे थे।”

उसकी आवाज़ टूट जाती है।

पार्वती देवी की आँखों से आँसू लगातार बह रहे हैं।

“मीठे का बहुत शौक था बिटिया को…”

वह रुँधे गले से कहती है।

“खासकर जलेबियों का। वही खाने गई थी। नहीं पता था कि…”

वाक्य पूरा नहीं होता।

वह फूट-फूट कर रो पड़ती है।

वर्षा की भी आँखें भर आती हैं।

गला रुँध जाता है।

वह चाय का कप एक ओर रखती है।

आगे बढ़कर पार्वती देवी के कंधे पर हाथ रखती है।

“हम कोशिश करेंगे,”

वह धीमे से कहती है।

उसी क्षण एक खुली जीप पास आकर रुकती है।

धूल उड़ती है।

जीप से तीन-चार आदमी उतरते हैं।

लेदर जैकेट।

कुर्ता-जीन्स।

किसी की आँखों पर काला चश्मा।

गले में मोटी सोने की चेन।

उन्हें देखते ही जानकीदास और पार्वती देवी सिमट जाते हैं।

उनमें से एक आगे बढ़ता है।

“आइए रिपोर्टर साहिबा,” वह मुस्कुराते हुए कहता है। “हमारे साहब बुला रहे हैं।”

वर्षा सीधी बैठ जाती है। “कौन साहब?”

“सुबेदार जी। यहीं के बड़े।”

वर्षा एक पल को विरोध करना चाहती है।

पर उन चेहरों के भाव — न आमंत्रण थे, न निवेदन।

उनमें से एक आदमी हाथ उठाकर अंगड़ाई लेता है।

कमीज़ के नीचे कमर में खोंसी हुई विदेशी हैंडगन चमकती है।

वह सहज स्वर में कहता है—

“घबराइए मत, मैडम। आपको यहीं वापस छोड़ देंगे। सही सलामत।”

आँगन में सन्नाटा।

जानकीदास कुछ कहना चाहता है,

पर शब्द नहीं निकलते।

वर्षा धीरे से उठती है।

नोटपैड बैग में डालती है।

एक बार पार्वती देवी की तरफ़ देखती है।

फिर बिना कुछ बोले जीप की ओर बढ़ जाती है।

जीप चल पड़ती है।

धूल का गुबार।

दूर जाती हुई जीप में सिर्फ़ वर्षा की आँखें दिखती हैं — पहली बार उनमें हल्का-सा डर है।


— जारी —