Trikon - 23 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 23 — छेदीपुरा रेस्क्यू

Featured Books
Categories
Share

Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 23 — छेदीपुरा रेस्क्यू

सराय के दरवाज़े टूटकर अंदर गिर चुके थे।

अंदर पहले से तैयार खड़े थे—

जॉन के विदेशी मर्सिनरी।

और प्रभु के आदमी।

सबके हाथों में मशीनगन्स।

एक पल के लिए सन्नाटा।

फिर—

तड़तड़तड़तड़!!!

गोलियों की बौछार गाड़ी पर टूट पड़ी।

शीशे चटक गए।

लोहे की बॉडी पर गोलियाँ बरसने लगीं।

अनीश और जोगी तुरंत गाड़ी से कूदे।

दरवाज़ों के पीछे पोज़िशन ली।

पर दुश्मनों का फायर-पावर इतना भारी था कि वे सिर भी नहीं उठा पा रहे थे।

जॉन आगे बढ़ा।

गोलियों की बारिश के बीच भी उसकी भारी आवाज़ सराय में गूँजी—

“Come play with daddy… you bastards!”

उसके मर्सिनरी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

बंदूकें लगातार आग उगल रही थीं।

अनीश दाँत भींचे बैठा था।

“जोगी… कुछ कर!”

जोगी ने तेज़ी से टैबलेट उठाया।

तीसरे ड्रोन का कमांड ऑन किया।

कुछ सेकंड बाद—

पीछे टूटे हुए दरवाज़े से

एक काला ड्रोन बिजली की तरह अंदर घुसा।

नीचे लगी मशीन-गन घूमी।

और अगले ही पल—

तड़तड़तड़तड़!!!

ड्रोन ने गोलियों की बौछार शुरू कर दी।

मर्सिनरी हड़बड़ा गए।

“It’s a drone!”

“Take cover!”

सब लोग इधर-उधर बक्सों और दीवारों के पीछे कूद पड़े।

उसी अफरा-तफरी में जॉन आगे लपका।

जोगी पर झपटा।

जोगी गोली चलाने ही वाला था कि—

जॉन का भारी मुक्का उसके चेहरे पर पड़ा।

जोगी पीछे लड़खड़ाया।

पर तुरंत सँभला।

घूमकर जॉन के चेहरे पर एक जोरदार लात मारी।

जॉन का सिर झटका खा गया।

इससे पहले वह सँभलता—

जोगी ने उसका कॉलर पकड़ा, टांगों के बीच हाथ रखा।

पूरी ताकत से उठाया।

और पास पड़े लकड़ी के बक्सों पर

धड़ाम!!!

जॉन जा गिरा।

पीठ पकड़कर तिलमिला उठा, चेहरे पर भीषण दर्द।

उधर अनीश भी कवर बदलते हुए फायर कर रहा था।

दो मर्सिनरी गिर चुके थे।

एक भागकर बाहर की ओर भागा।

एक बक्से के पीछे छिपे प्रभु ने यह सब देखा।

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

“ये तो बड़ा पंगा हो गया…”

वह धीरे-धीरे पीछे खिसका।

और अगले ही पल गिरता-पड़ता अँधेरे में भाग गया।

कुछ मिनट की लड़ाई के बाद—

सराय में सन्नाटा छा गया।

ड्रोन हवा में मंडरा रहा था।

रोटर्स की हल्की घरघराहट।

नीचे पड़ी थी — लाशें।

और टूटे बक्से।

जोगी जॉन की छाती पर पैर रखे खड़ा था।

जॉन बेहोश पड़ा था।

जोगी ने होंठ से बहता खून अंगूठे से पोंछा।

अनीश उसके पास आकर खड़ा हुआ।

“चल। लड़कियों को ढूँढते हैं।”

दोनों अंदर की तरफ बढ़े।

एक कमरे का दरवाज़ा बंद था।

अनीश ने धीरे से धक्का दिया।

दरवाज़ा खुला।

अंदर—

सब लड़कियाँ एक कोने में सिमटी बैठी थीं।

डरी हुई।

सहमी हुई।

दरवाज़ा खुलते ही वे और पीछे खिसक गईं।

पर अगले ही पल— उन्होंने देखा।

दरवाज़े पर खड़े थे— जोगी और अनीश।

दो मिनट बाद सराय के आँगन में अफरा-तफरी मची हुई थी।

अनीश लड़कियों को बस की ओर धकेल रहा था।

“जल्दी… जल्दी बच्चो… अंदर बैठो!”

लड़कियाँ भागती हुई बस में चढ़ रही थीं।

कोई रो रही थी।

कोई गिरते-गिरते बची।

तभी एक दुबली-सी लड़की बस के दरवाज़े पर आकर ठिठक गई।

उसकी आँखें फैल गईं।

वह घबराकर पीछे हटने लगी।

“नहीं… नहीं…” वह काँपती आवाज़ में बोली,

“मैं नहीं जाऊँगी…

तुम भी हमें कहीं और ले जाओगे…”

अनीश एक पल को रुका।

ऊपर—

बस की छत पर

जोगी राइफल ताने खड़ा था।

दूर अँधेरे में जैसे ही कोई हरकत दिखती—

धाँय! धाँय!

जोगी गोली चला देता।

नीचे अराजकता बढ़ रही थी।

अनीश ने हाथ जोड़ लिए।

उसने लड़की की तरफ़ देखते हुए कहा—

“बेटा, हाथ जोड़ता हूँ… बैठ जा, जल्दी।

हम तुम लोगों को बचाने आए हैं।”

लड़की अब भी काँप रही थी।

तभी पीछे से दूसरी लड़की, जो बस में चढ़ चुकी थी, नीचे झुकी।

उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

“आ जा… ये वही लोग हैं जिन्होंने हमें बाहर निकाला है…”

पहली लड़की की आँखों में पानी भर आया।

उसने काँपते हुए बस की सीढ़ी पकड़ी

और अंदर चढ़ गई।

ऊपर गोलियाँ चल रही थीं।

नीचे लड़कियाँ एक-एक कर बस में कूद रही थीं।

अनीश ने आख़िरी लड़की को अंदर धकेला।

फिर ऊपर देखा।

“आ जा, जोगी!”

जोगी ने आख़िरी बार चारों तरफ देखा।

फिर छलाँग लगाकर बस के दरवाज़े से अंदर घुस गया।

अनीश पहले ही ड्राइवर सीट पर था।

उसने नीचे झुककर तारों का जुगाड़ किया।

दो तार जोड़े।

चिंगारी।

इंजन घरघराया।

बस झटके से जिंदा हो उठी और आगे बढ़ी।

अनीश ने तुरंत गियर लगाया और स्टीयरिंग घुमाया।

उसी समय— ऊपर आसमान में

चारों ड्रोन तेज़ी से उनके साथ उड़ने लगे।

अनीश ने शीशे में पीछे देखा।

सराय दूर छूट रही थी।

कुछ सेकंड बाद जोगी ने पीछे की सीटों पर नज़र डाली।

उसका चेहरा सख़्त हो गया।

“अनीश… पाँच बच्चियाँ कम हैं।”

अनीश का हाथ स्टीयरिंग पर कस गया।

एक पल के लिए उसने आँखें बंद कीं।

दाँत भींचे।

जोगी बोला— “तो… वापस चलें?”

कुछ सेकंड सन्नाटा।

फिर अनीश ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

उसकी आवाज़ भारी थी।

“इन सबको भी खो देंगे।

अब यहाँ से निकलना है बस।”

बस अँधेरी कच्ची सड़क पर दौड़ती चली गई।

पीछे— सराय जल रहा था।

गाँव की संकरी गली पार कर बस जैसे ही अगली गली में मुड़ी—

अचानक सामने रास्ता बंद था।

दो ट्रैक्टर और एक बैलगाड़ी तिरछी खड़ी।

बीच में खड़ा था सरपंच दयाल बाबू।

हाथ में बंदूक।

साथ में दस-बारह लठैत।

दयाल चिल्लाया—

“बस रोक साले!

कोई लड़की बाहर नहीं जाएगी!”

बस के अंदर लड़कियाँ फिर डर से चीखने लगीं।

अनीश ने दाँत भींचे।

“पकड़ कर बैठो सब!”

बस की रफ्तार कम नहीं हुई।

ऊपर आसमान में मंडराते ड्रोन की तरफ जोगी ने टैबलेट घुमाया।

“लेफ्ट ट्रैक्टर…”

ड्रोन झपटा।

मशीनगन घूमी।

तड़तड़तड़तड़!

गोलियाँ सीधे ट्रैक्टर के फ्यूल टैंक पर पड़ीं।

एक सेकंड।

फिर—

धड़ाम!!!

ट्रैक्टर आग के गोले में उछल गया।

लठैत घबराकर इधर-उधर कूदे।

उसी पल अनीश ने स्टेयरिंग बाएँ मोड़ा।

बस पूरी ताकत से आगे बढ़ी।

धड़ाम!

बैलगाड़ी टूटती हुई किनारे उछल गई।

लकड़ी के पहिए बिखर गए।

पीछे से उड़ता ट्रैक्टर का मलबा बस के पिछले हिस्से पर आ गिरा—

पर मोटी बॉडी से टकराकर छितर गया।

बस झटके से निकल गई।

बस के अंदर जोगी पीछे की ओर भागा।

खिड़की से राइफल बाहर निकाली।

धाँय!

धाँय!

सरपंच दयाल बाबू छाती पकड़कर वहीं ढह गया।

बस तेज़ी से आगे बढ़ती गई।

कुछ सेकंड बाद—

छेदीपुरा की आखिरी झोपड़ियाँ पीछे छूटने लगीं।

बस अब गाँव के बाहर की सड़क की ओर दौड़ रही थी।

सराय के आँगन में सन्नाटा था।

टूटे बक्से।

बिखरे कारतूस।

और फर्श पर पड़े कई शरीर।

दो-एक लोग अब भी दर्द से कराह रहे थे।

एक कोने में बक्सों में भरे भूसे में आग भड़क रही थी।

धुआँ धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था।

ऊपर की एक टूटी ट्यूबलाइट

हल्की जल—बुझ रही थी।

उसी टिमटिमाती रोशनी में—

जॉन पड़ा था।

पीठ के बल।

चेहरा खून और धूल से सना।

कुछ सेकंड तक वह बिल्कुल निश्चल पड़ा रहा।

फिर—

उसकी उँगली हल्की-सी हिली।

एक भारी साँस।

और अचानक—

उसकी आँख खुल गई।

लाल।

क्रोध से भरी।

वह धीमे से कराहा।

दाँत भींचे।

फिर बुदबुदाया—

“This is not over.”

ट्यूबलाइट फिर एक बार झपकी।

और सराय के आँगन में फिर से अँधेरा गहरा गया।


— जारी —