सुबह।
पीली स्कूल बस हाईवे पर दौड़ रही थी।
अंदर लड़कियाँ चुप बैठी थीं।
कल रात का डर अभी भी हवा में था।
कुछ देर बाद बस अचानक हाईवे छोड़कर एक संकरी सड़क पर मुड़ गई।
एक लड़की ने धीरे से कहा —
“भैया, ये रास्ता स्कूल का नहीं है…”
ड्राइवर चुप रहा।
कुछ किलोमीटर आगे बस रुक गई।
सड़क किनारे एक ट्रक खड़ा था।
चार आदमी इंतज़ार कर रहे थे।
काली गाड़ी से प्रभु उतरा।
बस का दरवाज़ा खुला।
लड़कियों को जल्दी-जल्दी नीचे उतारा गया।
रोना, घबराहट, दबे हुए चीख।
उन्हें ट्रक के पीछे धकेल दिया गया।
तिरपाल गिरा।
प्रभु ने बस ड्राइवर की तरफ देखा।
“पुल।”
लड़कियों को लिए ट्रक धूल उड़ाता हुआ दूसरी दिशा में मुड़ गया।
कुछ मिनट बाद खाली बस फिर सड़क पर थी।
आगे पुराना पुल।
नीचे गहरी नदी।
बस पुल के बीच पहुँची।
ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला।
और चलते वाहन से कूद गया।
बिना ड्राइवर की बस कुछ सेकंड डगमगाई।
फिर रेलिंग तोड़ती हुई—
सीधे नदी में जा गिरी।
पानी में तेज़ धमाका हुआ।
कुछ ही सेकंड में बस आधी डूब गई।
—
दोपहर।
टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़।
“अनाथालय की बस नदी में गिरी — 25 बच्चियाँ लापता।”
गोता-खोर पानी में उतर रहे थे।
कैमरे चमक रहे थे।
—
साउथ मुंबई।
नवीना जांगिड़ को रिपोर्टरों ने उसके घर के बाहर घेर रखा था।
कैमरों के सामने उसकी आँखें नम थीं।
“ड्राइवर की भूल थी या बस की खराबी।
ये हमारी बच्चियाँ थीं…
हम उन्हें कभी नहीं भूलेंगे…”
कैमरे बंद हुए।
चेहरा तुरंत ठंडा हो गया।
आकर अपनी कार में बैठी।
उसने फोन उठाया।
मैसेज टाइप किया—
Reached?
कुछ सेकंड बाद जवाब आया—
On our way.
—
हाईवे।
धूल उड़ाता ट्रक सुनसान सड़क पर आगे बढ़ रहा था।
तिरपाल के नीचे से दबे हुए रोने की आवाज़ें आ रही थीं।
अचानक आगे बैरिकेड दिखा।
शहर का आखिरी पुलिस चेकिंग नाका।
एक जीप, दो मोटरसाइकिलें।
एक इंस्पेक्टर और तीन हवलदार।
इंस्पेक्टर ने हाथ उठाकर इशारा किया—
“ओए! साइड में लगा।”
ट्रक रुक गया।
इंस्पेक्टर आगे आया।
कॉलर पकड़कर ड्राइवर को नीचे खींच लिया।
“कहाँ जा रहा है बे?”
ड्राइवर हकलाया—
“सा… साब सब्ज़ी फल वगैरह हैं।”
इंस्पेक्टर ने तिरपाल की तरफ देखा।
अंदर से हल्की सिसकियाँ।
उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
“तिरपाल हटा बे।”
ड्राइवर जल्दी से बोला—
“जाने दो साब… लेट हो जाएगा।”
इंस्पेक्टर गरजा—
“अभी अंदर कर दूँगा साले? खोल पीछे।”
थोड़ी दूरी पर एक काली कार आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला।
प्रभु उतरा।
धीरे-धीरे चलते हुए इंस्पेक्टर के पास आया।
“इंस्पेक्टर साहब… ज़रा बात हो जाए?”
इंस्पेक्टर झल्लाया—
“क्या बात करेगा बे?”
फिर भी दोनों सड़क के किनारे चले गए।
प्रभु ने जेब से एक कार्ड निकाला।
सादा विज़िटिंग कार्ड।
कोई नाम नहीं।
सिर्फ कोने में बना हुआ उल्टा त्रिकोण।
इंस्पेक्टर ने कार्ड देखा।
भौंहें चढ़ गईं।
“ये क्या है बे?”
उसने कार्ड ज़मीन पर फेंक दिया।
“ट्रक खुलवा।”
प्रभु शांत स्वर में बोला—
“गलती कर रहे हो इंस्पेक्टर।”
इंस्पेक्टर हँसा।
“अच्छा ले एक और गलती?”
और पूरी ताकत से एक थप्पड़ जड़ दिया।
प्रभु का सिर एक तरफ झटका।
होंठ कट गया।
खून की पतली धार निकली।
उसने अंगूठे से खून पोंछा।
जबड़ा हिलाया।
और धीरे से इंस्पेक्टर की नेम प्लेट पढ़ ली—
“देशमुख।”
इधर इंस्पेक्टर वापस ट्रक की तरफ गया।
हवलदारों से बोला—
“तिरपाल हटाओ।”
तिरपाल उठा।
अंदर सहमी हुई लड़कियाँ बैठी थीं।
कुछ रो रही थीं।
कुछ पत्थर बनी हुई।
आँखों पर आँसू सूख चुके थे।
इंस्पेक्टर की आँखें फैल गईं।
“अच्छा… तो ये धंधे चल रहे हैं।”
वह गरजा—
“बाहर निकलो सब!”
लड़कियाँ हिल भी नहीं पाईं।
उसी समय इंस्पेक्टर का फोन बजा।
स्क्रीन पर नंबर देखकर उसका चेहरा थोड़ा बदल गया।
—
फोन के दूसरी ओर मुंबई पुलिस मुख्यालय।
कमिश्नर ऑफिस।
पूरी वर्दी में बैठी थीं—
कमिश्नर त्रिशा जैकब्स।
तेज़ नज़रें।
साफ़ आवाज़।
पीछे दीवार पर तिरंगा और पुराने पुलिस प्रमुखों की तस्वीरें।
बाहर कहीं दूर से एक दबा हुआ शोर उठा।
दूर के एक इंटेरोगेशन रूम में किसी से मार-पीट कर बयान लिया जा रहा था।
त्रिशा की पलक तक नहीं झपकी।
फोन पर बोलीं—
“इंस्पेक्टर देशमुख…
हम कमिश्नर त्रिशा जैकब्स बोल रहे हैं।”
कमरे में एक पल की चुप्पी।
फिर उनका अगला वाक्य—
“जो ट्रक आपने रोका है… उसे जाने दीजिए।”
फोन पर कुछ सेकंड ख़ामोशी रही।
हाईवे पर खड़ा इंस्पेक्टर देशमुख तिरपाल पकड़े खड़ा था।
उसके सामने सहमी हुई लड़कियाँ।
फोन से कमिश्नर त्रिशा जैकब्स की शांत आवाज़ आई—
“जो ट्रक आपने रोका है… उसे जाने दीजिए।”
देशमुख कुछ सेकंड चुप रहा।
उसने धीमे स्वर में कहा—
“मैडम… इसमें—”
त्रिशा जैकब्स ने उसे बीच में ही रोक दिया।
आवाज़ अब भी शांत थी।
पर उसमें आदेश की ठंडक थी।
“इंस्पेक्टर देशमुख… आपने मेरी बात सुनी नहीं।”
एक छोटा विराम।
फिर धीरे बोलीं—
“आपने आज कोई ट्रक नहीं रोका है।”
देशमुख के चेहरे की मांसपेशियाँ तन गईं।
उसने एक नज़र लड़कियों पर डाली।
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर फोन के उस पार से अंतिम वाक्य आया—
“और अगर आपने रोका है… तो समझिए आपने बहुत बड़ी गलती कर दी है।
उसे छोड़िये और मुख्यालय में मुझे आकर रिपोर्ट कीजिये।”
कॉल कट गया।
हाईवे पर हवा बह रही थी।
देशमुख कुछ पल वहीं खड़ा रहा।
फिर धीरे से तिरपाल वापस गिरा दिया।
हवलदारों की तरफ देखा।
“चलो… जाने दो।”
हवलदार हिचकिचाया—
“साब… अंदर तो—”
देशमुख गरजा—
“सुना नहीं? जाने दो।”
ट्रक का इंजन फिर गरज उठा।
धीरे-धीरे वह बैरिकेड पार करके आगे बढ़ गया।
कुछ दूरी पर खड़ा प्रभु यह सब देख रहा था।
वह झुका।
ज़मीन पर पड़ा कार्ड उठाया।
जेब में डाला।
फिर फोन निकाला।
एक छोटा सा मैसेज टाइप किया—
On track.
फिर धीरे-धीरे अपनी कार की तरफ लौटा।
दरवाज़ा खोलकर बैठ गया।
इंजन स्टार्ट करने ही वाला था कि अचानक उसकी छाती में हल्की धड़कन तेज़ हो गई।
उसने भौंहें सिकोड़कर एक गहरी साँस ली।
जेब से स्मार्टफोन निकाला।
स्क्रीन पर एक मेडिकल ऐप खुली।
Heart Rate: Elevated.
प्रभु ने हाथ से अपनी छाती थपथपाई।
“शांत…”
फिर फोन जेब में रख दिया।
कार स्टार्ट की।
और ट्रक के पीछे-पीछे चल पड़ा।
हाईवे पर फिर वही सन्नाटा रह गया।
उधर पुलिस मुख्यालय में
त्रिशा ने फ़ोन काटकर दूसरा नंबर मिलाया।
Secure Line.
—
मुंबई।
एक बड़े अनाथालय का हॉल।
मंच पर छोटी बच्चियाँ भजन गा रही थीं।
सामने कुर्सियों की पंक्ति में बैठी थी—नवीना जांगिड़।
तालियाँ बजाते हुए उसने हल्की मुस्कान दी।
तभी उसके फोन की स्क्रीन चमकी।
Secure Line.
उसने एक नज़र चारों ओर डाली।
फिर कॉल उठा ली।
धीमे स्वर में बोली—
“हाँ।”
दूसरी तरफ आवाज़ कसी हुई थी।
त्रिशा जैकब्स।
“नवीना, तू पागल हो गई है क्या?”
कुछ सेकंड की खामोशी।
“दिन दहाड़े पच्चीस लड़कियाँ?
और बस पानी में फिंकवा दी?”
नवीना ने आँखें घुमाईं।
सामने मंच पर बच्चियाँ गा रही थीं।
वह धीरे से बोली—
“अरे, VIP ऑर्डर था। अर्जेंट।
ऊपर से प्रेशर था।”
एक पल चुप हुई।
“स्वामिनी… का डायरेक्ट आर्डर था।”
वो नाम सुनते ही त्रिशा शांत हो गई।
नवीना दबी आवाज़ में बोली—
“हर चावल की बोरी का… एक खोखा।”
हल्के से हँसी।
“ऐसे अमीर क्लाइंट बार-बार नहीं मिलते।
आगे भी बिज़नेस देगा।”
त्रिशा की आवाज़ अब पहले से नीची थी।
“वो सब तो ठीक है पर…
बस एक्सीडेंट को लेकर बहुत मच-मच होगी।”
नवीना ने कंधे उचकाए।
“अरे इन लड़कियों को कौन पूछने आ रहा है?
दो-तीन दिन शोर होगा… फिर सब ख़त्म।
और तेरा कट भी आता ही होगा।”
उसी समय त्रिशा के डेस्क पर रखे दूसरे फोन की स्क्रीन चमकी।
एक मैसेज।
विदेशी क्रिप्टो वॉलेट में भारी रकम जमा।
त्रिशा की आँखों में चमक आ गई।
होंठों पर हल्की मुस्कान तैर गई।
उसने फोन पर कहा—
“ठीक है।”
और कॉल काट दी।
अनाथालय के हॉल में उसी समय तालियाँ गूँज उठीं।
मंच पर बच्चियाँ गीत खत्म कर चुकी थीं।
नवीना ने भी मुस्कुराकर ताली बजाई।
— जारी —