सुबह।
अनाथालय का गेट खुला था।
पीली स्कूल बस अंदर खड़ी थी।
इंजन धीमे-धीमे घरघर कर रहा था।
लड़कियाँ एक-एक करके चुपचाप बस में चढ़ रही थीं।
कोई बात नहीं कर रहा था।
कल रात की घटना के बाद
आँगन में जैसे डर की परत जम गई थी।
बस के पास एक लंबा आदमी खड़ा था, नाम प्रभु।
लगभग छह फुट लंबा।
काला कोट-सूट।
चेहरे पर कोई भाव नहीं।
वह हाथ में छोटी डायरी लिए
लड़कियों की गिनती कर रहा था।
एक…
दो…
तीन…
उसकी उँगली नामों पर चल रही थी।
अचानक वह रुक गया।
भौंहें सिकुड़ीं।
“एक कम है।”
संचालिका घबरा कर बोली—
“जी… सब तो यहीं हैं।”
प्रभु ने धीरे से सिर उठाया।
उसकी नज़र सीधी संचालिका के चेहरे पर टिक गई।
“नहीं।”
उसने धीमे स्वर में कहा।
“एक कम है।”
फिर थोड़ा झुककर फुसफुसाया—
“जाइए… ढूँढ़ कर लाइए।”
एक सेकंड रुका।
“नहीं तो…”
उसकी आँखें ठंडी थीं।
“…आपको भी इस बस पर बैठना होगा।”
संचालिका के गले में कुछ अटक गया।
उसने तुरंत सिर हिलाया।
और लगभग दौड़ते हुए अंदर भागी।
कुछ मिनट बाद वह वापस आई।
उसके साथ एक आख़िरी लड़की थी।
डरी हुई।
काँपती हुई।
प्रभु ने अपनी कलाई घड़ी देखी।
सात बजकर उनचास मिनट।
संचालिका ने जल्दी से उस लड़की को बस में बैठा दिया।
प्रभु की नज़र ड्राइवर से मिली।
ड्राइवर ने हल्का सा सिर हिलाया।
बस का दरवाज़ा बंद हुआ।
इंजन गरजा।
और बस गेट से बाहर निकल गई।
प्रभु वहीं खड़ा रहा।
कुछ सेकंड तक बस को जाता देखता रहा।
फिर मुड़ा।
पास खड़ी एक महंगी गाड़ी का दरवाज़ा खोला।
अंदर बैठा।
कार स्टार्ट हुई।
और बस के पीछे चल पड़ी।
—
गोदाम के दूसरे कोने में।
पुरानी दीवार के सामने एक बड़ा कंप्यूटर मॉनिटर जल रहा था।
नीली रोशनी कमरे में फैल रही थी।
उसके सामने झुका बैठा था — अनीश।
माथे पर हाथ रखे।
स्क्रीन पर काली पृष्ठभूमि थी।
बीच में एक छोटा सा एन्क्रिप्टेड वीडियो विंडो।
दूसरी तरफ बैठी थी — ज़ेरोइन।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ एक डिजिटल मास्क।
आवाज़ भी बदली हुई।
यांत्रिक।
जैसे किसी रोबोट की।
अनीश ने माथा रगड़ा।
“चक्कर ये है कि हमारे पास ‘सफ़ेद साड़ी वाली डायन’ के अलावा कोई क्लू नहीं है।”
कुछ सेकंड की चुप्पी।
फिर स्पीकर से आवाज़ गूँजी।
ज़ेरोइन बोली, “मैं ‘सफ़ेद साड़ी’ को यंग गर्ल्स के डेटा से क्रॉस-रेफरेंस कर रही हूँ।”
आवाज़ सपाट थी।
“पिछले बहत्तर घंटों के ट्रैफ़िक कैमरों और सीसीटीवी फुटेज पर एल्गोरिथ्म चलाऊंगी।”
अनीश कुर्सी से पीछे झुका।
“ये काम मैं तुम पर छोड़ता हूँ।”
“बिल्कुल।”
एक छोटा सा विराम।
“और कुछ?”
अनीश ने स्क्रीन की तरफ देखा।
“हम फिर कब मिलेंगे?”
उधर कुछ सेकंड की चुप्पी रही।
फिर वही यांत्रिक आवाज़।
“ना जाने कौन-कौन मेरे पीछे लगा है। I can't risk it।”
अनीश के चेहरे पर हल्की, थकी हुई मुस्कान आई।
कमरे में एक अजीब-सी ख़ामोशी भर गई।
फिर ज़ेरोइन बोली—
“ये लोग…”
एक पल रुकी।
“तुम्हें भी जगह बदलते रहना होगा अनीश।
त्रिकोण का नाम जहाँ आया… वहाँ मौत और हैवानियत ही देखी है।”
अनीश ने धीरे से सिर हिलाया।
“ठीक है।
कुछ मिले तो बताना।
बाय।”
स्क्रीन काली हो गई।
कॉल कट गया।
पीछे से आवाज़ आई।
“मामू?”
मालती दरवाज़े पर खड़ी थी।
अनीश ने पीछे मुड़कर देखा भी नहीं।
बस बोला—
“हाँ बेटा।
जोगी अंदर कमरे में आराम कर रहा है।
देख ले।”
गोदाम में फिर वही हल्की कंप्यूटर की भनभनाहट रह गई।
—
अंदर जोगी कुर्सी पर बैठा था।
कष्ट को छुपाने की कोशिश करता हुआ।
कमरे का दरवाज़ा खुला।
मालती अंदर आई—
हॉल्टर-नेक टॉप।
पीठ लगभग खुली।
काले रंग की फिटेड स्कर्ट।
चेहरे पर हल्का मेक-अप।
बाल खूबसूरत तरीके से स्टाइल किए हुए।
जोगी ने पलटकर देखा।
एक सेकंड ज़्यादा।
मालती ने उसकी नज़र पकड़ ली।
हल्की मुस्कान।
“सॉरी,” उसने चमचमाता लेदर बैग कुर्सी पर रखते हुए कहा,
“थोड़ा लेट हो गई।
मेरे पोस्ट-ग्रैड्स के दोस्तों की पार्टी है आज।
सोचा पहले आपको देख लूँ।”
उसने घड़ी की तरफ़ देखा।
फिर जोगी की हालत पर।
“पाँच मिनट हैं मेरे पास।
आप लेट जाइए।”
जोगी ने उसकी तरफ़ देखा।
कुछ कहना चाहा।
फिर चुपचाप पलंग पर लेट गया।
“जहाँ चोट लगी है, वहाँ तक कपड़ा ढीला कर दीजिए,” मालती ने नम्र स्वर में कहा।
एक पल की झिझक।
फिर जोगी ने वैसा ही किया।
मालती ने एक पैकेट से निकालकर नीले ग्लव्स पहने।
हाथों की हरकतें पूरी तरह पेशेवर थीं।
जाँच के दौरान जोगी के मुँह से अनायास एक सिसकारी निकल गई।
“हम्म… लेफ्ट में सूजन है,” मालती ने कहा।
“वहीं चोट लगी थी?”
“हाँ,” जोगी की आवाज़ भारी हो गई।
मालती ने सिर हिलाया।
“आपको डॉक्टर के पास जाना चाहिए।”
जोगी ने छत की तरफ़ देखा।
आँखें नम थीं।
“अभी कुछ दिन नहीं जा सकते,” वह धीमे बोला।
मालती कुछ सेकंड चुप रही।
फिर बोली—
“रुकिए… मैं एक क्रीम लगा देती हूँ।”
जोगी ने असहज होकर कहा—
“अगर तुम्हें ज़रा भी लिहाज़ हो तो—”
“नहीं,” मालती ने बात काट दी।
“आप लेटे रहिए।”
उसकी आवाज़ में कोई हिचक नहीं थी।
सिर्फ़ भरोसा।
क्रीम लगाकर मालती ने ग्लव्स उतारे।
“एक-दो दिन में सूजन काफी कम हो जाएगी।”
जोगी के चेहरे पर दर्द के बीच एक क्षणिक, असहाय मुस्कान आई।
उसने कपड़े ठीक किए।
मालती ने एक पल उसे देखा।
“रुकिए, मैं आपको पेन-किलर भी दे देती हूँ।”
वह अपना पर्स टटोलने लगी।
जोगी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
मालती के व्यवहार में प्रेम तो नहीं, पर एक ममता थी—
जिसने जोगी का दिल पिघला दिया था।
जहाँ हर कोई उस पर थूक रहा था, उसे विलेन बना दिया गया था,
वहीं मालती सच्चे दिल से उसे ठीक करना चाहती थी।
मालती ने जोगी के आँसू देखे।
दवाई का पत्ता एक ओर रखा।
धीरे से उसके पास आई।
और उसे गले लगा लिया।
“जोगिंदर जी, आप बहुत अच्छे इंसान हैं,” उसने धीमे कहा।
हल्का सा मुस्कुराई।
“अगर न होते… तो मेरे मामू आपको भी गोली से उड़ा देते।”
रोते हुए भी जोगी की हँसी छूट गई।
उसने आँसू पोंछे।
मालती ने पर्स उठाया।
दरवाज़े तक गई।
एक पल रुकी।
पीछे मुड़ी और हल्का-सा मुस्कुराई।
“पहलवान हैं आप।
इतनी जल्दी टूटेंगे नहीं।”
जोगी ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।
इस बार न दर्द था।
न शर्म।
बस एक छोटा-सा भरोसा।
बाहर से अनीश की आवाज़ आई—
“चल मालती बेटा, तुझे वापस छोड़ दूँ।”
मालती ने दरवाज़ा खोला।
“पार्टी देर तक चलेगी,” उसने हल्के स्वर में कहा,
“पर दर्द बढ़े तो कॉल करिएगा।”
वह बाहर चली गई।
कमरा शांत था।
पर जोगी के भीतर अभी भी हलचल थी।
—
उसी समय…
भिवंडी से चालीस किलोमीटर दूर
वही पीली बस हाईवे पर मुड़ी।
कुछ सेकंड बाद
उसका GPS सिग्नल अचानक गायब हो गया।
— जारी —
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