Trikon - 15 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 15 — अनाथालय

Featured Books
Categories
Share

Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 15 — अनाथालय

साउथ मुंबई।

InfluencerX टॉक सीरीज़ का मंच रोशनी में नहाया हुआ था।

स्पॉटलाइट के बीच खड़ी थी —

सफ़ेद साड़ी में, बड़ी बिंदी लगाए

नवीना जांगिड़।

उसकी आवाज़ आत्मविश्वास से भरी थी।

“हम मुंबई में पाँच और पूरे देश में बीस अनाथालय चलाते हैं —

सिर्फ गरीब, अनाथ और बेसहारा बच्चियों के लिए।”

हॉल शांत था।

लोग ध्यान से सुन रहे थे।

नवीना ने थोड़ा रुककर कहा —

“एक लड़की को जब डर लगता है…

तो कैसा लगता है — मैं समझती हूँ।”

उसकी आवाज़ भर्रा गई जैसे।

“और इसी दर्द ने मुझे प्रेरित किया।”

उसने हाथ जोड़ दिए।

“आप सबसे प्रार्थना है…

हमसे जुड़िए।

और इन बच्चियों के लिए दिल खोलकर दान दीजिए।”

कुछ सेकंड की चुप्पी।

फिर हॉल में ज़ोरदार तालियाँ गूँज उठीं।

टॉक ख़त्म होते ही भीड़ उसके चारों ओर जमा हो गई।

सेल्फ़ी।

ऑटोग्राफ़।

हाथ मिलाना।

कुछ युवा लड़कियाँ उससे गले मिलकर रो भी पड़ीं।

बाहर लॉन में हाई-टी लगा था।

चाय, कॉफ़ी, छोटे सैंडविच, केक।

नवीना सबके बीच मुस्कुरा रही थी।

जैसे किसी संत का आशीर्वाद बाँट रही हो।

कुछ देर बाद वह अपनी कार की तरफ़ बढ़ी।

ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला।

जैसे ही वह बैठने लगी— फोन बजा।

एक मैसेज।

Twenty bags of rice required. Urgent order.

नवीना का चेहरा तन गया।

उसने तुरंत टाइप किया।

Twenty is too much.

कुछ सेकंड बाद जवाब आया।

Big buyer from West.

Top tier clearance. No delay.

स्क्रीन पर नीचे सिर्फ़ एक शब्द चमका—

Swamini.

नवीना ने दाँत भींच लिए।

एक पल को स्क्रीन को घूरती रही।

फिर फोन बंद कर दिया।

कार में बैठ गई।

ड्राइवर ने पूछा—

“मैडम, घर?”

नवीना ने खिड़की से बाहर देखा।

फिर बोली—

“नहीं।

भिवंडी वाले अनाथालय चलो।”

कार धीरे-धीरे सड़क पर बढ़ गई।

रात।

भिवंडी के बाहर एक पुराना अनाथालय।

आँगन में हल्की पीली रोशनी थी।

लड़कियाँ सोने की तैयारी कर रही थीं।

कुछ बातें कर रही थीं।

कुछ हँस रही थीं।

गेट के बाहर एक कार आकर रुकी।

नवीना उतरी।

अनाथालय की संचालिका जल्दी-जल्दी बाहर आई।

“अरे मैडम! आपने बताया नहीं कि आप आने वाली हैं।”

नवीना मुस्कुराई।

“बस यूँ ही। बच्चों को देखना था।”

थोड़ी देर में सभी लड़कियाँ लाइन में लगा दी गईं।

नवीना की नज़र लड़कियों पर घूम रही थी।

जैसे कोई सामान परख रहा हो।

एक-एक चेहरा।

एक-एक कद।

एक-एक उम्र।

“सब स्कूल जाती हैं?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा।

“जी मैडम,” संचालिका बोली।

“सुबह आठ बजे बस आती है।”

नवीना ने सिर हिलाया।

“अच्छा है। पढ़ाई ज़रूरी है।”

उसकी आँखों में एक ठंडी चमक थी।

उसी समय दो लड़कियाँ बोल उठीं।

एक पेट पकड़े हुई थी।

“मैडम… हमारी तबीयत ठीक नहीं है।”

दूसरी बोली— “कल स्कूल न जाएँ क्या?”

संचालिका कुछ कहती उससे पहले नवीना बोल पड़ी।

“नहीं बेटा।”

उसकी आवाज़ में मिठास थी।

“स्कूल तो रोज़ जाना पड़ेगा ही।

नहीं तो ज़िन्दगी में आगे कैसे बढ़ोगी?”

दोनों लड़कियाँ चुप हो गईं।

तभी पीछे से एक लड़की सुनीता आगे आई।

सत्रह साल की।

चेहरे पर ज़िद।

आँखों में सीधा विरोध।

“क्यों जाना पड़ेगा?”

सुनीता ने तिरछी नज़र से नवीना को देखा।

“तुम कौन होती हो बोलने वाली?”

आँगन में सन्नाटा छा गया।

संचालिका घबरा गई।

“चुप! बदतमीज़!”

लेकिन सुनीता रुकी नहीं।

“हम सबको पता है तुम लोग क्या करते हो।”

उसने उंगली उठाई।

“बहुत दिन से देख रही हूँ मैं।

दो लड़कियाँ पिछले हफ्ते स्कूल गई थीं, पर वापस नहीं आईं।”

कुछ लड़कियाँ डरकर पीछे हट गईं।

सुनीता बोलती रही — “हमें बोला के उनके घरवाले उन्हें ले गए।

अरे कौन घरवाले? दोनों अनाथ थीं।”

नवीना ने उसे कुछ सेकंड देखा।

फिर हल्का मुस्कुराई।

“तू सुनीता है न?”

वह एक कदम आगे बढ़ी।

“पिछली बार भी तूने बदतमीज़ी की थी।

मैंने कुछ नहीं कहा था।”

उसने फुसफुसाकर कहा—

“पर मुझसे बद्तमीज़ी सही नहीं जाती।”

उसने अपने ब्लाउज़ के अंदर हाथ डाला।

एक पतली लोहे की सलाख निकाली।

और अगले ही पल— सीधे सुनीता की गर्दन में घोंप दी।

खून के छींटे नवीना के चेहरे और गर्दन पर आ पड़े।

सुनीता की आँखें फैल गईं।

गले से टूटी हुई आवाज़ निकली।

फिर वह ज़मीन पर गिर पड़ी।

खून धीरे-धीरे फर्श पर फैलने लगा।

सुनीता गिरते ही बाकी लड़कियाँ चीख पड़ीं।

नवीना अचानक दहाड़ी — “चुप!”

उसकी आँखें पागल शिकारी जैसी थीं।

“जिसने आवाज़ निकाली… अगली वही होगी।”

उसने धीरे से अपनी उंगली होंठों पर रखी।

सबकी आवाज़ वहीं थम गई।

“किसी ने कुछ नहीं देखा। है न?”

कुछ लड़कियों ने डरकर सर हिलाया, बाकी स्तब्ध खड़ी रहीं, गले में रुदन दबाए।

नवीना ने साड़ी के पल्लू से चेहरे और हाथ पर लगे खून को धीरे से पोंछा।

फिर संचालिका की तरफ़ देखकर बोली —

“कल बस समय पर निकलनी चाहिए। बच्चों की पढ़ाई में ढिलाई नहीं होनी चाहिए।”

“सुबह बस समय पर ही निकलेगी मैडम।” संचालिका के हाथ काँप रहे थे।

वह सिर्फ़ सिर हिला सकी।

नवीना ने फोन निकाला।

एक नंबर डायल किया।

“Cleaner crew चाहिए।”

एक पल रुकी।

“Location pin भेज रही हूँ।”

फोन काट दिया।

आँगन में खून की पतली लकीर फैल रही थी।

और ऊपर आसमान में चाँद चुपचाप देख रहा था।

उसी समय।

शहर के बाहरी हिस्से में।

पुराना गोदाम।

जोगी और अनीश की गाड़ी अंदर आकर रुकी।

जोगी नीचे उतरा।

अचानक रुक गया।

और दोनों टांगों के बीच हाथ रखकर झुक गया।

“स्साला…”

अनीश ने देखा।

“अभी भी दर्द है?”

जोगी दाँत भींचकर बोला—

“साले ने ज़ोर से मार दिया।”

अनीश के चेहरे पर शिकन। “मालती को बोलता हूँ चेकअप कर ले।”

जोगी ने सिर उठाया।

“हॉस्पिटल जाना चाहिए क्या?”

“अभी नहीं,” अनीश बोला।

“सेक्टर गरम है अभी।”

फिर दरवाज़ा बंद करते हुए कहा—

“बहुत ज़रूरत पड़ी तो ही रिस्क लेंगे।”

गोदाम के अंदर फिर वही सन्नाटा था।


— जारी —