Trikon - 14 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 14 — सफ़ेद साड़ी वाली डायन

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Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 14 — सफ़ेद साड़ी वाली डायन

अपराजिता लढवान की मौत को दो महीने बीत चुके थे।

शहर के बाहरी हिस्से में एक पुराना गोदाम।

ऊपर से टूटी हुई टीन की छत।

अंदर लोहे की गंध और पसीने की महक।

गोदाम के एक कोने में

एक मेज़ पर फाइलों का ढेर।

उनमें आधा डूबा हुआ बैठा था — अनीश।

चश्मा नाक के नीचे सरक आया था।

कागज़ पलटते-पलटते आखिर उसने सिर उठाया और मुस्कुरा उठा।

“मिल गया।”

अनीश मुस्कुराया।

“आख़िरकार एक ढंग की लीड मिल ही गई।”

फ़ाइल उठाकर फेंक दी।

थोड़ी दूर पर कोने में लगे छोटे से जिम में जोगी।

नंगे बदन, सिर्फ पैंट पहने, कानों में इयर-बड, तेज़ म्यूज़िक।

लोहे की मोटी जंजीरों से बँधे पत्थर को खींच रहा था।

हर कदम पर ज़मीन घिसटती आवाज़।

उधर से अनीश हँसता हुआ आया —

“जोगिंदर सांगवान, तैयार हो जा।”

जोगी ने सुना नहीं।

एक भारी हथौड़ा उठाया और

ट्रक के पुराने टायर पर लगातार वार करना शुरू किया।

धड़।

धड़।

धड़।

उसकी मांसपेशियाँ पहले से भी भारी हो चुकी थीं।

नसें उभर आई थीं।

अनीश हल्का गुस्साया —

“ये आजकल के बच्चे कानों में क्या ठूँसकर घूमते रहते हैं…”

“ओ पहलवान जी।”

जोगिंदर ने तुरंत इयर-बड निकाले।

“जी?”

“अब ये सब कसरत बंद। अब इन मांसपेशियों को इस्तेमाल करना है।

चल आज एक खबरी को तोड़ते हैं।”

जोगी ने हथौड़ा नीचे रखा।

हल्की मुस्कान।

“हाथ खुजला रहे हैं, अनीश सर।”

तभी दरवाज़ा खुला।

मालती अंदर आई।

गहरे लाल रंग का सलवार सूट, एक हाथ में दबा सफ़ेद कोट और स्टेथोस्कोप।

हाथ में स्टील के डिब्बे।

जोगी को देखकर एक पल को रुक गई।

जोगी ने तुरंत तौलिया उठाकर कंधों पर डाल लिया।

मालती बोली—

“आप लोगों के लिए खाना बना दिया है। दोपहर और रात का।”

अनीश ने सिर हिलाया।

“बेटी तेरे पोस्ट-ग्रैड के पेपर हैं न, तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।

हम लोग खाना बाहर से मँगवा लेंगे।”

मालती ने भौंहें चढ़ाईं।

“बिल्कुल नहीं।”

फिर अनीश की तरफ़ इशारा किया।

“आपको पिछले हफ्ते हाई कोलेस्ट्रॉल निकला था।”

जोगी हँसी रोक नहीं पाया।

मालती बोली—

“बाहर का गंदा खाना कम से कम।”

और डिब्बे मेज़ पर रखकर चली गई।

अनीश बड़बड़ाया—

“घर में डॉक्टर होना भी आफ़त है।”

 

मुंबई की एक पुरानी चॉल।

दो घंटे बाद।

संकरी गली।

पसीने, मसाले और सिगरेट की मिली-जुली गंध।

जोगी और अनीश चुपचाप चले जा रहे थे।

सादे कपड़े, कमर में खोंसी हैंडगन।

कमीज़ों से छिपी।

थोड़ा आगे चलने पर अनीश अपने हाथ में पेन से लिखा एक नंबर देखता है।

सामने एक दरवाज़ा निशानों और जंग खाए लोहे से भरा।

कुख्यात खबरी नंदू का घर।

दरवाज़ा खटखटाते हैं।

अंदर से भागने की आवाज़।

जोगी दरवाज़े पर लात मारकर तोड़ देता है।

अंदर एक दुबला-पतला सा इंसान खिड़की में फंसा छटपटा रहा है।

नंदू।

वह भागने की कोशिश करता है।

लेकिन जोगी उसे गर्दन से पकड़कर

सीधे ज़मीन पर पटक देता है।

फिर बाज़ू से पकड़ लेता है।

नंदू छटपटाता है।

अनीश —

“अरे भाई नंदू, थम जा।

कुछ सवाल पूछकर छोड़ देंगे तुझे।”

नंदू का स्वर तीखा था —

“मेरेको पता है सॉब आप क्या पूछने को आएला है।”

उसने अचानक जोगी की टांगों के बीच घूँसा मारा।

जोगी की आँखों में तारे दिख गए।

वह झुककर एक तरफ लुढ़क गया।

नंदू ने तेज़ी से पास की दराज़ से पिस्तौल निकाली।

धाँय।

अनीश पहले ही ट्रिगर दबा चुका था।

नंदू पेट पकड़े ज़मीन पर गिर पड़ा।

खून बह रहा था।

अनीश उसके पास झुका।

“मरते-मरते एक अच्छा काम कर जा।

मासूम लड़कियों का सवाल है।”

नंदू हँसा।

खून उसके होंठों से बह रहा था।

“इस साल… बहुत सी लड़कियाँ गायब होंगी…”

अनीश की आँखें सिकुड़ गईं।

“किस-किस को बचाओगे…” नंदू ने मुश्किल से कहा— “पहला वाला… शुरू हो चुका है…”

फुसफुसाया— “सफ़ेद साड़ी वाली… डायन से बच के रहना…”

और उसकी गर्दन ढीली पड़ गई।

 –

अगली सुबह, कोसों दूर साउथ मुंबई में मंच सजा था।

Social InfluencerX, टॉक सीरीज़ चल रही थी।

स्पॉटलाइट खुली।

मंच पर खड़ी थी —

सफ़ेद साड़ी में

बड़ी बिंदी लगाए

नवीना जांगिड़।

तालियाँ गूँज रही थीं।


— जारी —