थोड़ी देर बाद।
शहर के बाहर
एक बियाबान इलाका।
गाड़ी की हाई-बीम लाइट में एक चौकोर गड्ढा खोदा जा रहा था।
फावड़े चल रहे थे।
मिट्टी उछल रही थी।
जोगी हाँफते हुए बोला — “आज तो आपने रेस करवा दी, सर।”
अनीश हल्का मुस्कुराया।
“इन सब को कम अंतराल पर ठोकना ज़रूरी था।
नहीं तो एक सपोला मर जाए तो बाकी सब बिलों में छिप जाते हैं।”
जोगी ने पसीना पोंछा। “इस तीसरे साँप को मैं ख़त्म करूँगा।”
अनीश रुका।
“कभी जान ली है किसी की?”
“उस पहलवान की गर्दन तोड़ी थी,” जोगी बोला।
“वो सेल्फ-डिफेन्स था। गर्म खून।
कोल्ड-ब्लड में मारना अलग चीज़ होती है।”
जोगी ने धीमे से कहा— “आज शायद वो रेखा पार करनी पड़ेगी।”
उसकी साँस भारी थी।
तभी गाड़ी की डिक्की से दबी हुई आवाज़।
अनीश ने फावड़ा गाड़ दिया।
डिक्की खोली।
अंदर वर्षा।
मुँह में कपड़ा।
हाथ-पाँव बँधे।
तेज़ी से खुद को ऐंठती हुई।
अनीश को देखकर शांत हो गई।
कुछ देर बाद।
ताज़ा खुदे गड्ढे के किनारे वर्षा खड़ी थी।
रोती हुई।
सामने जोगी।
हाथ में पिस्तौल।
“जोगी प्लीज़… मैं हाथ जोड़ती हूँ।
उस अपराजिता लढवान ने मुझ पर इतना दबाव बना दिया था…”
“श्श्श।”
जोगी ने इशारा किया।
हल्की हँसी।
“पाँच करोड़ रुपयों का दबाव भारी ही होता है। क्यों, अनीश भाई?”
अनीश ने सिगरेट सुलगाई।
“जल्दी ख़त्म कर इसे, रात बहुत लंबी हो चुकी है।”
जोगी ने पिस्तौल उठाई।
“मेरा बस एक सवाल है।”
वर्षा सुबकती रही।
“मैंने तो तुम्हारी हरदम रक्षा की।
तुम्हारा ध्यान रखा।
फिर मैं ही क्यों?”
वर्षा कुछ कह नहीं पाई।
“देखो जोगी—”
अनीश ने लंबा कश लिया।
“भाई, साँप उसी को काटता है जिसकी आस्तीन में होता है।
सिंपल है।”
वर्षा ने बाज़ू से आँसू पोंछे।
जानती थी फँस चुकी है, पर एक आखिरी कोशिश की।
“जोगी, मेरी आँखों में देखो।
तुम पर लगे सारे इल्ज़ाम मैं साफ़ करवा दूँगी।
एकदम क्लीन चिट।
मैं खुद सबको बताऊंगी कि कैसे तुमने मेरी रक्षा की। हाँ।”
अनीश की तरफ़ मुड़ी।
“सर आपको भी राजकीय सम्मान दिलवाना मेरा ज़िम्मा।”
अनीश — “मैडम ये गोलीबाजी मेरे साथ मत ही करो।”
वर्षा के थोथे शब्द अब जोगी के कानों में चुभ रहे थे।
वो रात जो उसके साथ काटी थी, अब यादगार पल नहीं एक नासूर बन चुकी थी।
वो ईमानदारी और सच को जानने की,
सच्चाई के लिए लड़ने की शक्ति जो उसने वर्षा में देखी थी, वो सब एक बहुत बड़ा फरेब था।
धोखा हुआ था उसके साथ।
और उस धोखे ने उसे अब गुनहगार, मुजरिम बना दिया था।
पिछले कुछ दिनों के सारे दर्द उसकी आँखों के सामने तैर गए।
वर्षा उसके चेहरे के भाव समझ गई थी।
अंत निकट था।
सोचा — क्या गलती की मैंने, जोगी, नेता, भीड़ सबको परख कर ही चली थी।
फिर अनीश की ओर देखा।
इसे नहीं परख पाई।
ये आदमी टूटा हुआ था।
और टूटा हुआ आदमी बिकता नहीं।
जोगी ने दाँत पीसे,
ऊँगली ट्रिगर पर गई।
वर्षा की आँखें बड़ी, मुँह से निकला, “नहीं—”
रात बिल्कुल शांत।
फिर—एक ज़ोरदार गोली की आवाज़ इलाक़े में गूँज गई।
पर जंगल ने उसे निगल लिया।
कहीं दूर पंछी उड़े।
फिर सब शांत पड़ गया।
कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला।
अनीश ने राख झाड़ी।
“सिस्टम से खेलने चली थी,” उसने कहा।
“पर ये खेल ही इसे खा गया।”
जोगी के हाथ काँप रहे थे।
आज उसने सच में कोल्ड-ब्लड का खून किया था।
अब वापस जाने की कोई सड़क नहीं बची थी।
कुछ देर बाद— मिट्टी गिरने की आवाज़।
फावड़े।
भारी साँसें।
गाड़ी की लाइटें बुझ गईं।
अँधेरा लौट आया।
—
एक हफ्ते बाद।
जोगी आईने के सामने खड़ा अपनी गर्दन और कंधे पर पड़े निशान और दाग देख रहा था।
पिछले कुछ दिनों ने मानो उसकी आयु के कई वर्ष खा लिए थे।
शर्ट पहनकर वह बाथरूम से बाहर निकला।
अनीश मेज़ पर झुका हुआ था।
फ़ाइलों के ढेर में आधा ग़ायब।
नज़र उठाई।
“सब ठीक?”
“जी,” जोगी बोला।
“सब बढ़िया।
आपको कुछ मिला?”
अनीश ने कान खुजाया।
“कुछ पुरानी फ़ाइलें उठा रहा हूँ, कुछ नई।
कुछ दस्तावेज़ पूरे हैं, कुछ आधे—रेडैक्टेड।
कहीं कटी-फटी तस्वीरें।
कहीं इंडस्ट्री के लिंक।
अंडरवर्ल्ड के कनेक्शन।
विदेश का मनी ट्रेल।
पूरा कच्चा चिट्ठा।”
जोगी पास जाकर बैठ गया।
“पर,” अनीश बोला,
“वही एक चिन्ह बार-बार आ रहा है।”
“कौन सा?”
“Trikon!”
वो नाम सुनते ही जोगी जैसे ठिठक गया।
इस सब मार-काट और भाग-दौड़ में वह उस चिन्ह को लगभग भूल ही गया था।
कुछ देर कमरे में चुप्पी रही।
फिर अनीश ने एक फ़ाइल आगे सरकाई।
जोगी ने खोली।
क़ानूनी दस्तावेज़ जैसी लिखावट।
कुछ सामान भेजने का परचेस ऑर्डर।
नीचे स्टाम्प और हस्ताक्षर।
ऊपर कोने में—
एक उल्टा त्रिकोण, काले रंग में।
जोगी ने पन्ना पलटा।
एक और इनवॉइसनुमा रसीद।
ऊपर कोने में वही निशान।
हर पेज पर, उसी कोने में।
जोगी रुका।
“यही निशान…”
अनीश ने उसकी तरफ़ देखा।
“हाँ। वही।”
जोगी की आँखों के आगे चितरंजन का चेहरा कौंध गया।
जहाँ ये दिखे, उससे दूर रहना।
“आप शायद पहले से जानते थे कि ये क्या है,” जोगी ने धीमे स्वर में कहा।
अनीश कुर्सी पर टिक गया।
“ये क्या है, ये अब भी नहीं जानता।
पर जहाँ-जहाँ ये दिखा है, वहाँ डर, मौत और मातम ही मिला है।”
वह कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
“शुरू में मुझे लगता था ये बस प्रिंटिंग की गलती होगी।
पर दर्जनों फ़ाइलों पर यही निशानी मिली।
विज़िटिंग कार्ड्स पर।
कुछ वीडियो के बैकग्राउंड में।
और अब इन दस्तावेज़ों में।
नाम कहीं नहीं।
बस एक ईमेल मिला था—”
उसने एक प्रिंट-आउट आगे किया।
“Trikon की मीटिंग जल्द होगी।”
कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा।
जोगी ने कंधे उचकाए।
फ़ाइल साइड में रख दी।
“कैसे बैठे पढ़ते हैं आप ये सब?
मुझे ये काग़ज़-पत्तर समझ नहीं आते।
और आपको ये सब मिलते कहाँ से हैं?”
अनीश हल्का-सा हँसा।
“कुछ अपनी रिसर्च।
कुछ क्राइम ब्रांच।
कुछ एजेंसियाँ।
सबको जवाब चाहिए।
ब्रेकथ्रू चाहिए।
तो मेरी शैतान खोपड़ी उधार ले लेते हैं।”
जोगी मुस्कुराया।
“हँस मत, पहलवान,” अनीश बोला।
“फ़ाइलें देख।
आजकल सब ऑनलाइन शेरलॉक होम्स बने फिरते हैं।
असली माल अब भी हार्ड पेपर के दस्तावेज़ों में है।”
जोगी ने एक फ़ाइल उठा ली।
—
विदेश।
एक अनजान लोकेशन।
एक एयरक्राफ्ट हैंगर के बाहर
राज लढवान सूट-बूट में खड़ा था।
सामने एक ट्रक आकर रुका।
उस पर लदा एक बड़ा शिपिंग कंटेनर।
एक हट्टा-कट्टा गुंडा आगे बढ़ा।
कंटेनर का दरवाज़ा ज़ोर से धकेला।
लोहे के लोहे से रगड़ने की तीखी आवाज़।
राज पास गया।
अंदर से बदबू का तेज़ भपका।
झाँका।
ऊपर हल्की नीली रोशनी।
अंदर—
डरी-सहमी लड़कियाँ।
सिकुड़ी हुई।
चुप।
राज मुस्कुराया।
एक कदम पीछे हटा।
गुंडे ने दरवाज़ा फिर से बंद कर दिया।
पायलट आकर राज के पास रुका।
“Your goods are here.
My payment?”
राज ने जेब टटोली।
“ओह… सॉरी।”
एक बिज़नेस कार्ड निकाला।
पायलट को दिया।
पायलट ने पलटकर देखा।
उसका चेहरा खिल उठा।
कार्ड के कोने में—
उल्टा काला त्रिकोण।
Trikon.
— जारी —
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