सुबह का समय था।
एक दुबला-पतला युवक थाने की ओर जा रहा था।
हाथ में स्टील की केतली और छह चाय से भरे काँच के गिलास।
रोज़ का काम।
रोज़ की राह।
मोड़ पर कोई दीवार से अलग हुआ।
अनीश।
लड़का चौंका, फिर मुस्कुराया — “अरे अनीश सर!”
अनीश ने उँगली होंठों पर रखी।
पास बुलाया।
कान में कुछ फुसफुसाया।
लड़के का चेहरा उतर गया।
“सर… ये…?”
अनीश ने बिना जवाब दिए
नोटों की मोटी गड्डी उसकी शर्ट की जेब में ठूँस दी।
“कुछ नहीं होगा।
बस ये वाला कप… ठीक जगह पहुँचना चाहिए। और मिलेंगे।”
उसने जेब से एक छोटी सफ़ेद गोली निकाली।
चाय के एक ग्लास में गिरा दी।
गोली घुल गई।
चाय का रंग नहीं बदला।
अनीश पीछे हट गया।
“जा।”
लड़का काँपता हुआ आगे बढ़ गया।
थाने के अंदर हवलदार फाइलों में लगे थे।
किसी ने मज़ाक किया — “अरे, आज इतनी देर?”
लड़के ने मुस्कुराने की कोशिश की।
एक-एक कर ग्लास बाँटता गया।
आख़िरी ग्लास धीरे से एक मेज़ पर रख दिया।
नेम प्लेट चमक रही थी — इंस्पेक्टर संभावित सिंह
“सर आपकी स्पेशल, कम शक्कर।”
संभावित ने बिना देखे कप उठा लिया।
एक लंबा घूँट।
लड़का बाहर निकल गया।
उसके कदम तेज़ थे।
—
दो घंटे बाद
शहर का दूसरा छोर।
एक ऊँची इमारत की छत।
अनीश लेटा था।
लंबी स्नाइपर राइफल ट्राइपॉड पर टिकी हुई।
दूर सड़क दिख रही थी।
पेड़ों की कतार।
बीच में एक खाली गैप।
वहीं से रैली गुज़रनी थी।
नीचे सड़क पर
भीड़।
नारे।
ढोल।
खुली जीप पर
अपराजिता लढवान।
गले में फूलों के हार।
हाथ हिलाती हुई।
“ज़िंदाबाद—” के नारे।
भीड़ चीख रही थी।
भीड़ के भीतर
नकली दाढ़ी-मूँछ लगाए
जोगी।
सादा कुर्ता।
भीड़ का एक चेहरा।
उसने हल्के से अपने कान को दबाया।
“अनीश जी… तैयार रहिए।”
ऊपर छत पर अनीश ने साँस रोकी।
उँगली ट्रिगर के पास आई।
स्कोप में — अपराजिता।
जीप आगे बढ़ी।
पेड़ों के बीच का खाली हिस्सा नज़दीक आया।
एक सेकंड।
बस एक सेकंड।
अपराजिता सीधी, साफ़, बिना रुकावट के निशाने में।
ट्रिगर दबा।
धाँय।
गोली हवा चीरती हुई गई।
साइलेंसर के बावजूद एक तीखी धात्विक आवाज़।
अपराजिता का सिर झटका खाकर पीछे गया।
अगले ही पल उसका शरीर पीछे खड़े कार्यकर्ताओं पर गिर पड़ा।
खून।
हार बिखरे।
जीप रुकी।
चीखें।
“गोली! गोली चली!”
अफरातफरी।
भीड़ भागी।
जोगी मुड़ा।
धीरे-धीरे चलता हुआ फिर तेज़ी से भीड़ में गुम हो गया।
उधर छत पर अनीश ने राइफल खोली।
पार्ट्स अलग किए।
बैग में डाले।
एक बार नीचे देखा।
चेहरे पर कोई भाव नहीं।
वह सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।
वहाँ थाने में संभावित सिंह अपनी कुर्सी पर था।
आँखें खुली हुईं।
मुँह से झाग।
चाय का गिलास आधा खाली।
एक हवलदार ने हिलाया।
“सर?”
कोई जवाब नहीं।
“अरे… सर!”
कुर्सी पीछे झुकी।
संभावित ज़मीन पर गिर पड़ा।
“एम्बुलेंस बुलाओ!”
अफरा-तफरी।
फाइलें बिखरीं।
चाय फैल गई।
शहर में दो खबरें एक साथ चलने वाली थीं।
एक — सांसद की हत्या।
दूसरी — एक इंस्पेक्टर की रहस्यमयी मौत।
और किसी को नहीं पता था कि दोनों धागे एक ही हाथ से खींचे गए थे।
—
शहर का एक जिम।
शीशों से घिरा हुआ।
लोहे की गंध।
पसीना।
म्यूज़िक की भारी बीट।
वर्षा ट्रेडमिल से उतरी।
साँस तेज़ थी।
टी-शर्ट पीठ से चिपकी हुई।
उसने शीशे में खुद को देखा।
पसीने की चमक।
आँखों में वही पुरानी तेज़ी।
एक हट्टा-कट्टा ट्रेनर पास आया।
बाँहें नसों से भरी हुई।
गर्दन पर पसीने की धार।
“गुड सेशन, मैम,” उसने मुस्कुराकर कहा।
“आज आप काफ़ी एग्रेसिव थीं।”
वर्षा ने पानी की बोतल लेते हुए
अनायास उसकी कलाई पकड़ ली।
हल्का-सा दबाव।
जाँचती हुई।
“मैं हमेशा एग्रेसिव रहती हूँ,”
उसने धीमे स्वर में कहा।
ट्रेनर पल भर को चुप रहा।
फिर बोला,
“पुश-अप फिर से?
या कुछ और… इंटेंस?”
वर्षा ने कंधे घुमाए।
गर्दन एक तरफ़ झुकाई।
“मेरी पीठ में खिंचाव है,”
उसने बिना पीछे देखे कहा।
“थोड़ा मसाज कर दोगे?
एक्स्ट्रा फ़ीस दूँगी।”
एक सेकंड की खामोशी।
फिर—
“ज़रूर, मैम।”
—
शॉवर एरिया।
काँच की दीवारें।
भाप पहले से जमी हुई।
पानी की आवाज़ शुरू हुई।
ट्रेनर काँच के दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा।
भाप में वर्षा की परछाईं हल्की-सी हिलती दिख रही थी।
कपड़ों की लेयर्स उतर रही थीं।
“अंदर आओ,” वर्षा ने धीरे-धीरे अपने बाल ऊपर बाँधे।
पीठ ट्रेनर की तरफ़।
“यहीं,” उसने कहा।
पीठ दिखाते हुए।
ट्रेनर ने हाथ आगे बढ़ाए।
पहले झिझक।
फिर पेशेवर स्पर्श।
उसके हाथ लगाते ही, वर्षा के बदन में बिजली-सी दौड़ गई।
वो उसकी ओर घूम गई।
ट्रेनर ने उसे चूमना चाहा पर वर्षा ने रोक दिया।
“नीचे,” उसने कहा।
आदेश की तरह।
कोई गुंजाइश नहीं।
ट्रेनर झिझका।
फिर घुटनों के बल आ गया।
भाप और भी गाढ़ी हो गई।
पानी की धार तेज़ हुई— आवाज़ें ढँकने के लिए काफ़ी।
वर्षा ने आँखें बंद नहीं कीं।
वह ऊपर खड़ी रही— पूरी तरह नियंत्रण में।
कुछ पल बाद
ट्रेनर की साँसें बिखरी हुई थीं।
उसकी गर्दन झुकी हुई।
नज़रें ज़मीन पर।
वर्षा ने एक कदम पीछे हटकर
तौलिया उठाया।
“बस,” उसने कहा।
“काफ़ी है।”
ट्रेनर चुपचाप निकल गया।
कुछ देर बाद।
वर्षा बाहर निकली।
गीले बाल।
तौलिया कंधे पर।
लॉकर रूम की ओर बढ़ी।
लॉकर खुला।
फोन हाथ में आते ही — वाइब्रेशन।
एक के बाद एक।
Breaking News
Alert
Message
Missed Call
उसने स्क्रीन देखी।
“MP Aparajita Ladhwan shot dead during rally.”
उसकी उँगलियाँ सुन्न हो गईं।
एक और नोटिफिकेशन।
“Suspected sniper attack.”
फिर — कलीग्स के मैसेज।
“Are you safe?”
“Call me NOW.”
“Where are you?”
वर्षा की साँस उखड़ गई।
फोन हाथ से फिसलते-फिसलते बचा।
उसके दिमाग़ में सिर्फ़ एक आवाज़ —
यहाँ नहीं रुकना है।
तेज़ क़दमों से घर पहुँची।
इधर-उधर देखती।
घबराती।
दरवाज़ा बंद।
कुंडी चढ़ाई।
अलमारी खुली।
कैश।
ज्वेलरी।
पासपोर्ट।
सब कुछ बैग में ठूँसती हुई।
शीशे में अपना चेहरा देखा — डरा हुआ।
पहली बार सच में।
चाबी उठाई।
बाहर भागी।
कार।
ड्राइवर सीट।
इग्निशन।
इंजन स्टार्ट।
उसे लगा — पीछे कुछ हिला।
रियर-व्यू मिरर।
कुछ नहीं।
उसने गहरी साँस ली।
खुद को कोसा।
तभी— फुस्स्स… चेहरे पर तेज़ जलन।
आँखों में आग।
एक स्प्रे।
वह चीख भी नहीं पाई।
दुनिया घूमी।
स्टियरिंग हाथ से छूटा।
आख़िरी चीज़ जो उसने देखी — कार की छत।
और एक साया, जो झुककर दरवाज़ा खोल रहा था।
अंधेरा।
— जारी —