Trikon - 11 in Hindi Crime Stories by Varun Vilom books and stories PDF | Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 11 — पूस की रात

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Trikon - एक्शन सीरीज़ - अध्याय 11 — पूस की रात

संभावित सिंह सामने तनकर खड़ा था।

चेहरे के एक तरफ़ जले के पुराने निशान —

दाग़दार, चकत्तों जैसे उभरे हुए।

अपराजिता अपने डेस्क पर एक फ़ाइल पलट रही थी।

कुछ पल बाद उसने उसे तेज़ आवाज़ के साथ बंद कर दिया।

“अनीश की लाश कहाँ है?” अपराजिता की आवाज़ धीमी थी, पर धारदार।

“तूने तो कहा था कि एक्सीडेंट में कोई नहीं बचा। सिर्फ़ जोगिंदर सांगवान।”

संभावित सिंह ने पसीना पोंछा।

“जी वो… उस समय—”

“बकवास बंद कर!” अपराजिता गरजी।

कुर्सी से थोड़ा आगे झुकी।

“अड़तालीस घंटे।

मुझे अनीश चाहिए। ज़िंदा… या मुर्दा।

समझा?”

संभावित सीधा होकर सलाम ठोंकता है।

“जी मैडम।”

“और सुन,” अपराजिता बोली,

“इस बार फेल हुआ तो तेरी पोस्टिंग नक्सल बेल्ट में पक्की समझ।”

“ज… जी।”

वह तेज़ क़दमों से बाहर चला गया।

शहर के दूसरे छोर पर।

घिरदयाल समोसे वाले की दुकान से थोड़ा दूर

अनीश और जोगी खड़े थे।

भेस बदला हुआ।

साधारण कपड़े।

सिगरेट का धुआँ हवा में घुल रहा था।

आस-पास रेहड़ियों पर पुलिस के हवलदार — चाय, सुट्टा, फ़ास्ट फ़ूड।

जोगी के पसीने छूट रहे थे।

फुसफुसाया, “कहाँ ले आए, सर?

ये इलाका तो पुलिस वालों का गढ़ है।”

अनीश शांत था।

“और इसीलिए यहाँ हमें कोई नहीं ढूँढेगा।

इसी चायवाले से ही थाने में नाश्ता जाता है।”

घिरदयाल की दुकान पर एक दुबला-पतला युवक चाय उबाल रहा था।

पीछे से मालिक की आवाज़ आई—

“अरे, सब-इंस्पेक्टर साहब के लिए कम चीनी वाली रखना, छोटी!”

“जी साहब!” युवक ने जवाब दिया।

अनीश ने सिर नहीं घुमाया।

बस कलाई की घड़ी देखी।

समय नोट किया।

राख झाड़ी।

जोगी चुप खड़ा रहा।

अगली सुबह।

अपराजिता अपने दफ़्तर में बैठी थी।

फाइलें साइन कर रही थी।

दरवाज़ा खुला।

“मैम, आपने बुलाया था?”

वर्षा लैपटॉप बैग कंधे पर डाले भीतर आई।

“आओ बेटा,” अपराजिता मुस्कुराई।

“आने वाले चुनावों की मीडिया रणनीति पर बात करनी थी।”

“ज़रूर,” वर्षा ने कुर्सी खींची।

“मैंने कुछ प्रेज़ेंटेशन बनाए हैं। और टॉकिंग पॉइंट्स भी।”

अपराजिता ने उसे गौर से देखा।

“अगर ईश्वर ने मुझे बेटी दी होती…

तो बिल्कुल तेरे जैसी होती।”

वर्षा हल्का-सा मुस्कुराई।

लैपटॉप खोला।

स्क्रीन की रोशनी दोनों के चेहरों पर पड़ी।

शाम ढल चुकी थी।

शहर वाली कोठी से काफी दूर एक गाड़ी खड़ी थी।

अँधेरे में।

दो साये गाड़ी के अंदर बैठे थे।

निगाहें फाटक पर।

वर्षा बाहर निकली।

फोन पर बात करती हुई।

कार के अंदर एक बड़े कैमरे से हल्की क्लिक।

समय नोट।

कुछ देर बाद अपराजिता की गाड़ी निकली।

एक और क्लिक।

अगले दिन शाम।

अनीश के ख़ुफ़िया ठिकाने की बत्तियाँ जल चुकी थीं।

दीवार पर बड़ा बोर्ड टंगा था।

फोटो।

लाल धागे।

नक्शे।

तारीखें।

नाम।

वर्षा।

अपराजिता।

राज।

संभावित।

और कई चेहरे।

धागे एक-दूसरे से जुड़े हुए।

पीछे से मालती आई।

चाय की ट्रे लिए।

अनीश ने बिना कुछ कहे कप उठाया।

चुस्की ली।

जोगी ने भी कप उठाया।

उसकी और मालती की नज़रें मिलीं।

एक पल।

फिर झुक गईं।

मालती चुपचाप चली गई।

अनीश ने बोर्ड पर एक बिंदु पर उँगली रखी।

“यहाँ।”

जोगी ने सिर हिलाया।

“पर कब?”

अनीश ने घड़ी देखी।

“तीन दिन बाद। पूस की रात।”

छोटा विराम।

“ठंड होगी। सड़कें खाली रहेंगी।”

कमरे में सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक बची रही।

कुछ देर बाद

जोगी ने दोनों खाली कप उठाए।

किचन में आकर सिंक के पास रख दिए।

मालती एक पैन में सब्ज़ियाँ भून रही थी।

तेल की हल्की छन-छन।

जोगी बिना कुछ कहे लौटने लगा।

दरवाज़े तक पहुँचा, फिर एक पल रुका।

“मेरी देखभाल करने के लिए… धन्यवाद।”

मालती ने आँच धीमी की।

उसकी तरफ़ मुड़ी।

“I’m studying to be a doctor,” उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

“देखभाल करना मेरा फुल-टाइम जॉब होगा।”

एक पल ठहरी।

जैसे कुछ तौल रही हो।

फिर सीधा पूछा—

“आप लोग… क्या करने वाले हो?”

जोगी ने भौंहें सिकोड़ीं।

“क्या मतलब?”

“मामा जी कुछ बताते नहीं,” उसने धीमे से कहा।

“पर ये जो सब प्लानिंग चल रही है…”

जोगी का चेहरा कठोर हो गया।

“आप जितना कम जानें… उतना बेहतर है।”

वह मुड़ा।

बाहर चला गया।

किचन में सिर्फ़ पैन पर पड़ती सब्ज़ियों की आवाज़ रह गई।

मालती कुछ पल दरवाज़े की तरफ़ देखती रही।

फिर आँच थोड़ा और धीमी कर दी।


— जारी —