बंड्या
कुछ दर्द बयां नहीं हो सकते,
महज़ चंद अल्फ़ाज़ों से।
तो कब तक अंदर ही अंदर घुटता रहेगा तू,
ऐ बंड्या...
तू जानता है कि तू गलत नहीं है,
पर तुझे तेरे ही अपनों के द्वारा गलत ठहराया जाता है।
सब छूट जाते हैं पीछे,
जब आखिर बात आती है सच की।
सच का साथ देना हर किसी को नहीं आता,
हिम्मत नहीं होती है हर किसी की—
कि वो सच का दामन थामे ज़िंदगी को जिए।
हर दर्द का कोई मरहम नहीं होता,
कुछ दर्द बस सहने के लिए होते हैं।
सच और आत्मसम्मान का गला घोंटते हुए,
बस यूँ ही खामोश जीने के लिए होते हैं।
कुछ मजबूरियाँ तुम्हें अपनी ही ज़िंदगी को,
खत्म करने के लिए मजबूर कर देती हैं।
मरने का शौक किसी को भी नहीं होता,
पर यह ज़िंदगी और दिखावे के रिश्ते तुम्हें—
रोज़ तिल-तिल मरने पर मजबूर कर देते हैं।
मगर सुन ऐ बंड्या...
इस खोखली दुनिया के लिए तू खुद को मत मिटा,
जो सच समझ न सके, उनके आगे सिर मत झुका।
यह जंग तेरी अपनी है, इसे लड़कर ही जीतना है,
सच अकेला सही, पर सच के साथ ही जीना है।