" शाहकार-ए-मोहब्बत "
मोहब्बत भी फिर से इक बार हो रही है।
मुलाकात उनसे अब बार बार हो रही है।
हवाओं में भी जैसे घुल गई है एक महक,
कि धड़कन आज बेहद बेकरार हो रही है।
न जाने कैसा जादू है उनकी निगाहों का,
कि हर खता मोहब्बत में बेशुमार हो रही है।
ज़माने भर के शिकवे खो गए हैं ज़हन से,
बस उनकी गुफ़्तगू ही साज़गार हो रही है।
न जाने किस ज़मीं को छू लिया है तूने,
कि तेरी शायरी 'व्योम' शाहकार हो रही है।
✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर.